CG Board Class 9 Hindi Solutions Unit 4 छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य Chapter 4.1 सुरुज टघलत हे – CGBSE Solutions PDF

CG Board Class 9 Hindi Solutions Unit 4 छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य Chapter 4.1 सुरुज टघलत हे are given below for Hindi Medium Students.

CG Board Class 9 Hindi Solutions Unit 4 छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य Chapter 4.1 सुरुज टघलत हे


Page No. 89

अभ्यास-

पाठ से :-

निर्देश:  हिंदी में दिए गए प्रश्नों के उत्तर हिंदी में तथा छत्तीसगढ़ी में दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी मातृभाषा में लिखिए।

Q.1. ‘‘टघल-टघल के सुरुज झरत हे’’ इस पंक्ति का क्या आशय है?

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि कहता है कि सूर्य तेज गर्मी से पिघलने लगा है और पिघल कर धरती पर नीचे गिरने लगा है | अर्थात गर्मी के दिनों में सूर्य पिघल-पिघल कर संपूर्ण धरातल पर गर्मी की वर्षा कर रहा है |

Page No. 89

Q.2. कविता में तेज गर्मी के एहसास का भाव निहित है। इसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर :- कविता में भयानक गर्मी जब पड़ती है तो सभी जीव-जंतुओं का हाल बेहाल हो जाता है | पशु-पक्षी पानी के लिए तड़पते हैं | तालाब, नदी, पोखर, कुआं सभी सूखने लगता है | मजदूर काम करते वक्त पसीने से तर-बतर  हो जाते हैं और कड़ी धूप में भी काम करने को मजबूर होते हैं | शुष्क गर्म हवा के थपेड़े उन्हें झुलसाती है | पेड़-पौधे सूखने लगते हैं | अर्थात पानी की कमी हो जाती है | नंगे पैर चलना असंभव हो जाता है | कोलतार की बनी सड़कें गर्मी से पिघलने लगती है | अर्थात् सड़के तवा की भांति गर्म हो जाती है | जिसके फलस्वरूप ग्रीष्म ऋतु में काम करने वाले मजदूर दोपहर में काम करना बंद कर देते हैं |

Page No. 89

Q.3. ग्रीष्मकाल में झाँझ के चलने से मनुष्य किस प्रकार प्रभावित होता है?

उत्तर :- ग्रीष्म काल में झाँझ अर्थात गर्म हवा के चलने से मनुष्य का शरीर झुकसने लगता है, होठों से पानी सूखने लगता है, होठों पर पपड़ी बन जाती है | ऐसा लगता है जैसे चारों ओर से आग की वर्षा हो रही है | जिससे घर से निकलना मुश्किल हो जाता है | अर्थात ग्रीष्म ऋतु में झाँझ (लू) चलने से मनुष्य के कान, आँख, संपूर्ण चेहरा और शरीर झुलस जाते हैं तथा पृथ्वी की तपन के कारण पैदल चलना दुश्वार हो जाता है |

Page No. 89

Q.4. इन पंक्तियों का अर्थ लिखिए-

‘‘चट-चट जरथे अँगना बैरी

 तावा बनगे छानी

 टप-टप टपके कारी पसीना 

 नोहर होगे पानी।’’

उत्तर :- तेज गर्मी से आँगन तप रहा है | घर की छतें इतनी गरम हो गई है कि जैसे रोटी बनाने के लिए तवा गर्म हो गया है | पानी को देखे(बरसों) बहुत दिन हो गए हैं | इस गर्मी में शरीर तथा चेहरा आदि से काला-काला पसीना टपक रहा है | अर्थात शरीर से निरंतर पसीना टपक रहा है | पानी भी मिलना दुर्लभ हो गया है |

Page No. 89

Q.5. ग्रीष्मकाल में पानी का अभाव हो जाता है। कवि ने किन पंक्तियों में इस बात का उल्लेख किया है?

उत्तर :-     “फिनगेसर ले रेंगत-रेंगत

                 पानी मिलिस पोंड़ म।

                 नदिया पातर-पातर होगे

                 तरिया रोज अँटावत हे

                टप-टप टपके कारी पसीना

                नोहर होगे पानी।

Page No. 89

Q.6. ‘पलपला‘ और ‘भोंभरा’ शब्द के अर्थ में क्या अंतर है?

उत्तर :- पलपला :-पलपला का आशय चिलचिलाती धूप या आग बरसाती गर्मी से है | भोंभरा :-  भोंभरा का अर्थ धरती को लंबे समय तक गर्म रहना या तपने से है | ग्रीष्म ऋतु में भीषण गर्मी एवं उमस से शरीर से पसीना टपकता रहता है तथा ग्रीष्म ऋतु में गर्म धूप को भोंभरा कहते हैं |

Page No. 89

Q.7. ‘हर-हर के दिन आगे’ ले आप का समझथव?

उत्तर :- हर-हर के दिन आगे अर्थात ग्रीष्म काल में लू चलने लगती है | पेड़ अपने पत्ते गिरा देते हैं | गर्म-गर्म हवा शरीर को झुलसा देती हैं अर्थात तेज लू या बवंडर चलने के दिन करीब आ गए हैं |

Page No. 89

पाठ से आगे :-

Q.1. ग्रीष्मऋतु में तालाब/नदी के सूख जाने पर जल-जीवों पर क्या प्रभाव पड़ता है? लिखिए।

उत्तर :- ग्रीष्म ऋतु में तालाब, नदी आदि के सूख जाने पर प्राणी मात्र जल की कमी से त्रस्त हो जाते हैं | जलीय जीव पानी की कमी के कारण तड़प तड़प कर मर जाते हैं | कुछ दलदल के अंदर चले जाते हैं | कुछ बाहर दूसरी जगह चले जाते हैं |

Page No. 89

Q.2. गर्मी के दिनों में पानी की समस्या पर अपने आस-पास के अनुभवों को लिखिए।

उत्तर :- गर्मी के दिनों में पानी की समस्या बड़ी गंभीर समस्या है | अर्थात गर्मी के दिनों में पानी की समस्या आने पर मानव, जीव-जंतु, पशु-पक्षी सभी परेशान हो जाते हैं | गर्मी से बचने के लिए हर प्राणी ठंड व पानी में डूबना चाहता है | अर्थात आसपास नदी, तालाब सूख जाने से जीव-जंतुओं को पीने का पानी नहीं मिलता | लोग पीने के लिए दूर-दूर से पानी लाते हैं | पेड़-पौधे सूख जाते हैं | पीने के पानी के लिए लोग लड़ाई झगड़ा करते हैं | शहरों में टैंकर से मोहल्ले में पानी की व्यवस्था की जाती है, जिसे लेने के लिए लोग लड़ते झगड़ते हैं| परंतु जब पानी पीने के लिए भी नहीं मिलता है तब बहुत से पशु पक्षी व मानव पानी न मिलने पर मृत्यु को प्राप्त करते हैं |

Page No. 89

Q.3. नगरीकरण के कारण लगातार वृक्ष काटे जा रहे हैं। वृक्षों के कटने से प्रकृति पर पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख कीजिए |

उत्तर :- नगरीकरण के प्रभाव से वातावरण को प्रदूषित हो चुका है। पेड़-पौधे कटते जा रहे है और जमीन की उर्वरा शक्ति भी कमजोर पड़ती जा रही है। गांवों के लोगों का शहरों की ओर पलापन की इसका एक मुख्य कारण है। इनके शहरों में आने से पेड़-पौधे कम हुए और पक्के मकान बने जिसके कंक्रीट का प्रयोग होता है। जिसके कारण से तापमान बढ़ता जा रहा है। अर्थात् वायुमण्डल में गर्मी बढ़ती जा रही है। पेड़-पौधों के कटने से जीव-जन्तुओं के रहने के लिए स्थानों का अभाव होता जा रहा है।शहरों में एयर कंडीशनर के इस्तेमाल के कारण भी हमारे वायुमण्डल में जहरीली गैसें जैसे- कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, तथा सल्फर डाईऑक्साइड आदि गैसे फैल रही है। दूषित हवा के प्रभाव के कारण बहुत सी बीमारीयां फैल रही है।

जिसका प्रत्यक्ष कारण हम महामारियों के रूप में देख रहे है। जो कि वायु संक्रमण के कारण फैलती है। यदि ऐसा ही होता रहा तो मानव जाति के लिए अपना अस्तित्व बचा पाना असंभव होगा।

Page No. 89

Q.4. टप-टप, रिमझिम, चम-चम, बिजली, घुमड़ते बादल, काली-घटा, साथ-साथ, हवा, उफनते नदी-नाले, झूमते पेड़ आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए वर्षा ऋतु पर एक कविता/लेख लिखिए।

उत्तर :-  कविता :- 

            रिमझिम रिमझिम मेघ बरसे है सावन के 

            टप-टप टप-टप गिरती बूंदे तरूओं से छन के 

            चम-चम बिजली चमक रही है रे डर में घन के

            थम-थम दिन के तम के सपनें जगगे मन के।

                                       ऐसे पागल घुमड़ते बादल बरसे नहीं धरापर

                                       काली घटा से गिरती बौछारें झर-झर

                                       हवा हर हर करती दल मर्मर तरूचर्चर

                                       उफनती नदियां नाले झूमते पेड़ उपवन में

                                       तड़-तड़पड़ती धार वारि की उनपर चंचल

                                      टप-टप झरती कर मुख से कल बूंदें झलमल

नाच रहे पागल हो ताली दे दे कर

झूम-झूम सिर नीम हिलाती सुख से विहल

हर सिंगार झरते बेला कलि बढ़ती पल-पल

हंसमुख हरियाली में खग कुुल गातें मंगल

                                 रिमझिम रिमझिम क्या कुछ कहते बूंदों के स्वर

                                 रोम सिहर उठते छूते के भीतर अंतर ।

                                रज के कण-कण में तृण-तृण की घुलकित भरे।

                                पकड़वारि की धार झूलता है मेरा मन

                                आओ रे सब मुझे घेर करगाओं सावन।

इन्द्रधनुष के झूले में झूले मिल सब जन

फिर-फिर आए जीवन में सावन मन भावना ।।

Page No. 90

भाषा के बारे में :-

Q.1. निम्नलिखित छत्तीसगढ़ी मुहावरों के हिंदी अर्थ लिखिए।

नोहर होना, फोड़ा परना, कान तिपना, आँखी मा आगी जलना, आगी फूँकना, पथरा

फोरना, साँस उड़ना।

उत्तर :- 

मुहावरेअर्थ
1. नोहर होना2. फोड़ा परना3. कान तिपना4. आँखी मा आगी जलना5. आगी फूँकना6. पथरा फोरना7. साँस उड़ना दुर्लभ होना | छाला पड़ना | कान गरम करना | क्रोधित होना | आग जलाना | कठिन परिश्रम करना | मृत्यु हो जाना |

Page No. 89

Q.2. कविता में आए युग्म शब्दों को छाँटकर लिखिए जैसे-टप-टप, चम-चम। इसी तरह

पाठ्यपुस्तक में हिंदी के भी युग्म शब्द आए हैं। उनकी सूची बनाइए।

उत्तर :- टघल-टघल,  रेंगत-रेंगत,  पातर-पातर,  चट-चट,  टप-टप,  साँय-साँय,  लस-लस, लक-लक,  नस-नस,  लकर-लकर, धकर-धकर, हँकर-हँकर |

Page No. 89

योग्यता विस्तार

Q.1. प्रकृति वर्णन से संबंधित अन्य कवियों की छत्तीसगढ़ी कविताओं/गीतों का संकलन कीजिए।

उत्तर :-

Q.2. पवन दीवान जी की अन्य हिंदी कविताओं का संकलन कीजिए।

उत्तर :-

Q.3. छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्रों में छत्तीसगढ़ी की प्रकाशित कविताओं का संकलन करें और उन पर अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए।

उत्तर :-

Q.4. छत्तीसगढ़ के अन्य रचनाकारों की कविताएं संकलित कर पढ़िए।

उत्तर :-

Q.5. जब किसी कविता की पंक्ति में अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन होता है तब वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। ‘‘टघल-टघल के सुरुज, झरत हे धरती ऊपर’’ में अतिशयोक्ति अलंकार है।

उत्तर :-

Leave a Reply

Discover more from CGBSE Solutions

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading