CG Board Class 9 SST Solutions Chapter 11 लोकतंत्र का विचार एवं विस्तार are given below for Hindi Medium Students.
CG Board Class 9 SST Solutions Chapter 11 लोकतंत्र का विचार एवं विस्तार
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प्रश्न 01 : कप्तान बनाने के दोनों तरीकों में से कौन सा तरीका लोकतांत्रिक है और क्यों?
उत्तर : कप्तान बनाने में दोनों तरीकों में से बच्चों की राय लेकर कप्तान का चयन करने का तरीका लोकतांत्रिक होगा | क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां के शासन की बागडोर वहां रहने वाली जनता जनार्दन के हाथों में है | अतः हम कह सकते हैं कि बच्चों की सलाह से ही कप्तान का चयन किया जाना चाहिए, ऐसा करने से बच्चों के मन में लोकतंत्र की भावना जागृत होगी तथा इस कारण उनके कोमल मन में हमारे लोकतंत्र की जड़ें और भी मजबूत होंगी |
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प्रश्न 02 : क्या परिवार का निर्णय लोकतांत्रिक है? क्या इस निर्णय से संबंधित व्यक्ति की इच्छा के लिए स्थान होना चाहिए ?
उत्तर :परिवार का यह निर्णय लोकतांत्रिक नहीं है क्योंकि भारतीय संविधान हमें अपने मौलिक अधिकारों का हक प्रदान करता है | अतः रोजी का यह मौलिक अधिकार है कि वह अपनी इच्छा अनुसार आगे पढ़ने वाले विषयों का चयन स्वयं करें | हां इस निर्णय में संबंधित व्यक्ति अर्थात रोजी की इच्छा के लिए ही विशेष स्थान होना चाहिए | क्योंकि यह फैसला उसके रुचि व आने वाले भविष्य की दिशा निर्धारित करेगा |
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प्रश्न 03 : लोकतंत्र की विभिन्न इकाइयों के लिए चुने जाने वाले प्रतिनिधियों का जानकारी पता कीजिए –
उत्तर :
| क्र | इकाई | प्रतिनिधि का पद |
| 1 . | ग्राम पंचायत | सरपंच |
| 2 . | जनपद अध्यक्ष | जिला पंचायत |
| 3 . | जिला अध्यक्ष | अध्यक्ष महापौर (मेयर) |
| 4 . | नगर पंचायत | नगर पंचायत अध्यक्ष |
| 5 . | नगर पालिका | नगर पालिका अध्यक्ष |
| 6 . | नगर निगम | महापौर |
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प्रश्न 04 : लीबिया किस देश का उपनिवेश था? लीबिया में तेल एवं प्राकृतिक गैस के भंडार मिलने पर लिबीया की शासन व्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ा? लीबिया के युवा इसे किस तरह का राज्य बनाना चाहते थे और क्यों ?
उत्तर : लीबियां 10 फरवरी सन् 1947 तक इटली का उपनिवेश था । 10 फरवरी 1947 के बाद इंग्लैंड, फ्रांस, और संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे अपने संरक्षण में ले लिया। लीबिया सन् 24 दिसंबर सन् 1951 में पूर्व रूप से स्वतंत्र हुआ और स्वतंत्रता के आठ साल के बाद लीबिया में विशाल मात्रा में तेल और गैस का भण्डार प्राप्त हुआ। तेल और गैस के भंडार प्राप्त होने के बाद यहां के राजा और कुछ शक्तिशाली परिवारों के द्वारा इस पर नियंत्रण कर लिया गया और इसका मनमाने ढंग से दोहन और इस्तेमाल करने लगे। उस समय उत्तरी अफ्रीका में राष्ट्रवादी आन्दोलनों के लहर चल रही थी, जिसका असर लीबिया के युवाओं पर भी देखने को मिला वे लीबिया को एक ऐसा आधुनिक राष्ट्र बनाना चाहते थे। जिसमें जनता की भलाई हो और लीबिया के लोगों को शोषण से मुक्ति मिले। खासकर लीबिया की आबादी कविलाई क्षेत्रों में बहुतायत थी जहां कि जनता कबिले में बंटी हुई थी और वहां पर विशेषकर महिलाओं की स्थित बहुत दयनीय थी। ये युवा लोग कविलाई युद्धों को समाप्त कर महिलाओं के हितों के उत्थान करना चाहते थे। और लीबिया में शान्ति की स्थापना करना ही इनका मूल उद्धेश्य था। जिससे कि पेटोलियम से होने वाली आय सभी को प्राप्त हो और देश तथा जनता का विकाश किया जा सके।
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प्रश्न 05 : कर्नल गद्दाफी ने लीबिया की प्रगति के लिए कौन – कौन से कदम उठाए?
उत्तर : सन 1969 में कर्नल मुअम्मर गद्दाफी द्वारा राजतंत्र का अंत करके सत्ता अपने हाथों में ले लिया गया | कर्नल गद्दाफी ने लीबिया की जनता की प्रगति और संरक्षण के लिए बहुत से कार्य किए, जिसमें प्रमुख कार्य तेल भंडारों का राष्ट्रीयकरण किया गया | लीबिया की अधिकतर आबादी घुमंतू थी, जिन्हें ने एक जगह आवास उपलब्ध कराकर रोजगार के अवसर प्रदान किए गए | जिनसे वे अपना भरण-पोषण कर सकते है | गद्दाफी ने महिलाओं के उत्थान के लिए बहुत कार्य किए, उन्होंने महिलाओं को पुरुषों के बराबर सभी क्षेत्रों में अधिकार दिया और साथ ही साथ बहु विवाह की प्रथा पर भी प्रतिबंध लगाया | लीबिया में सभी को मुफ्त स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधा सुनिश्चित की गई और सभी को कम दर पर मकान उपलब्ध कराए गए, जिसके कारण लीबिया के लोगों की औसत आयु 50 वर्ष से बढ़कर 78 वर्ष हो गयी | सन् 2010 तक लीबिया में स्त्री और पुरुष का साक्षरता दर 90% रहा और इसी कारण पूरे अफ्रीका में लीबिया का स्तर सर्वोच्च है |
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प्रश्न 06 : कर्नल गद्दाफी द्वारा किए गए कार्यो का लीबिया के लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर : कर्नल गद्दाफी द्वारा किए गए सुधार कार्य का लीबिया के लोगों और वहां के जनजीवन पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला लीबिया में हो रहे तेजी से प्रगति के कारण शहरीकरण नवीन आर्थिक विकास और नौकरियों के अवसर उपलब्ध होने लगे जिसका अर्थ यह निकला कि यहां के लोगों को कबीलाई और घुमंतू जीवन से मुक्ति मिली और जीवन में स्थायित्व की स्थापना हुई विभिन्न जनजातियों के लोग आपस में संघर्ष को छोड़कर मिलकर साथ रहने लगे|
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प्रश्न 07 : गद्दाफी के शासन को क्या लोकतांत्रिक शासन प्रणाली कहेंगे? चर्चा करें |
उत्तर : गद्दाफी के शासन को हम लोकतांत्रिक शासन प्रणाली कभी भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि उन्होंने राज्यतंत्र का सत्ता पलट कर स्वयं सत्ता पर आसीन हुए थे | उनका चुनाव जनता द्वारा नहीं किया गया था, राजतंत्र के दमनकारी और भेदभाव के कारण उन्हें कुछ जन समर्थन प्राप्त था, किंतु गद्दाफी का निर्वाचन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं किया गया था, इसलिए हम गद्दाफी की सरकार को लोकतांत्रिक सरकार नहीं कह सकते हैं |
गद्दाफी और उसके द्वारा बनाए संगठन को RCC(Revolutionary command council) कहते हैं | जिसका लोकतंत्र में विश्वास नहीं था | सरकार ने आम लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए संगठनों का गठन किया, उनके चुनाव भी होते थे, केंद्र में विधानसभा का गठन भी किया गया, किंतु इन सभी संगठनों को Rcc के आदेशों को मानना पड़ता था, और Rcc के खिलाफ जाने या विरोध करने पर किसी भी संगठन या आम आदमी का बलपूर्वक दमन कर दिया जाता था |
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प्रश्न 8 : अरब बसन्त के संबंध में शिक्षक से चर्चा करें|
उत्तर ::- सन 2010 में लीबिया के पड़ोसी देश ट्यूनीशिया में एक व्यापारी की हत्या के विरोध में विद्रोह हो गया, जो मिस्र, लीबिया, यमन, बहरीन और सीरिया तक फैल गया | इस विरोध का संचालन मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से किया गया, जिसे किसी भी देश की सरकार को नियंत्रित करना कठिन हो गया, और यही क्रांतिकारी लहर अरब बसंत के नाम से लोकप्रिय हुई |
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प्रश्न 09 : लीबिया के लोग लोकतंत्र क्यों चाहते थे जबकि उन सबको सर्वश्रेष्ठ जीवन स्तर प्राप्त था |
उत्तर : यह सही है कि लीबिया के लोगों को सर्वश्रेष्ठ जीवन स्तर प्राप्त था, किंतु वहां लोकतांत्रिक सरकार और शासन प्रणाली न होने के कारण क्षेत्रगत पर विकास कार्यों और अन्य सुविधाओं में भेदभाव किया जाता था | किसी क्षेत्र विशेष का ज्यादा महत्व और सुविधाएं प्राप्त होती थी, अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा और साथ ही लोगों को अभिव्यक्ति की आजादी नहीं थी | टेलीविजन, रेडियो ,समाचार पत्रों पत्रिकाओं और सूचना के सभी संसाधनों पर सरकारी नियंत्रण था | कोई भी व्यक्ति या संस्था सरकारी भ्रष्टाचार या सरकार की गलत नीतियों का विरोध नहीं कर सकती थी | लीबिया का आम जनमानस इन सरकारी नियंत्रण और दमन से परेशान होकर लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना चाहता था, जिसमें वह स्वतंत्र होकर जीवन यापन कर सके |
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प्रश्न 10 : गद्दाफी सरकार लीबिया में होने वाले विद्रोह पर नियंत्रण क्यों नहीं कर पाई?
उत्तर : सन 2011 में लीबिया के अल वायदा शहर में व्याप्त भ्रष्टाचार की आग पूरे लीबिया में फैल गई, सरकारी समाचार तंत्र और अन्य संस्थाएं इस प्रदर्शन को रोकने में सफल नहीं हो सकी | क्योंकि जन सूचनाओं के आदान-प्रदान का माध्यम सोशल मीडिया और इंटरनेट था, जिस पर सरकार नियंत्रण नहीं कर सकी और समय के साथ साथ इस आंदोलन में और तेजी आई | इसी बीच लीबिया के पड़ोसी देश ट्यूनीशिया में लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना हो गई | इस समाचार ने लीबिया के आंदोलनों में आग में घी का काम किया, जिससे आंदोलन और उग्र और हिंसक हो गया | सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए सेना लगाई और पूरे देश में गृह युद्ध छिड़ गया और नागरिक समूह अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने लगे | विश्व के कई लोकतांत्रिक देशों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ लीबिया में लोकतांत्रिक सरकार का गठन करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने विद्रोहियों तथा नागरिक संगठनों की मदद करना शुरू कर दिया | किंतु गद्दाफी सरकार ने विद्रोह को दबाने के लिए हवाई मामलों का सहारा लिया, जिसे रोकने के लिए माटो संगठन अर्थात अमेरिका ,इंग्लैंड ,फ्रांस ,जर्मनी ने गद्दाफी पर आक्रमण कर दिया, जिसका सामना गद्दाफी नहीं कर सका और मारा गया, इन्हीं सब कारणों से गद्दाफी विद्रोह पर नियंत्रण नहीं कर सका |
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प्रश्न 11 : लीबिया के लोकतांत्रिक संघर्ष में मोबाइल और इंटरनेट की क्या भूमिका रही?
उत्तर : लीबिया में लोकतांत्रिक संघर्ष में मोबाइल और इंटरनेट की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी| क्योंकि और जो भी संचार के माध्यम से वे सरकारी नियंत्रण में थे, उस पर सूचनाएं प्राप्त नहीं होती थी, यदि प्राप्त होती थी तो उसे सरकार अपने पक्ष में बनाकर प्रसारित करती थी | ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से लोगों को सही और सटीक जानकारी मिलती थी, और इसमें सरकारी हस्तक्षेप भी नहीं होता था | इंटरनेट के माध्यम से ही आंदोलन एक छोटे से स्थान से पूरे लीबिया में व्याप्त हो गया और पूरा देश लोकतांत्रिक आंदोलन में एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक साथ संघर्ष किया और इसी एकता के कारण लीबिया में लोकतंत्र की स्थापना संभव हो सकी|
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प्रश्न 12 : लोकतंत्र संघर्ष के कौन – कौन से प्रमुख मुद्दे थे?
उत्तर : लीबिया में आंदोलन के प्रमुख कारण लीबिया में व्याप्त भ्रष्टाचार, क्षेत्र विशेष की अनदेखी बेरोजगारी, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन, सभी को समान अवसर उपलब्ध न होना आदि प्रमुख कारण थे |
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प्रश्न 13 : शिक्षा व संचार माध्यम में जनता पर क्या प्रभाव उत्पन्न की?
उत्तर : शिक्षा से लीबिया की जनता को अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा हुई और संचार के माध्यम से वह विश्व के अन्य देशों से जुड़े और उन्हें अपने अधिकारों का सरकार के कर्तव्य का ज्ञान हुआ, जो कि वहां कि तानाशाही सरकार नहीं कर रही थी, और उनके दमन और अधिकारों का हनन किया जा रहा था | अतः हम कह सकते हैं कि शिक्षा और संचार ने लीबिया में सकारात्मक लोकतंत्र परिवर्तन की नींव डाली, जिससे वहां लोकतंत्र की स्थापना का शंखनाद हो सका |
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प्रश्न 14 : प्रारंभ में भारत व वर्मा में क्या समानता एवं क्या अंतर था?
उत्तर : भारत और वर्मा में समानताएं :-
1.भारत की तरह वर्मा भी ब्रिटेन का उपनिवेश था |
2. भारत की तरह वर्मा में भी चावल की ज्यादा पैदावार होती थी |
3. उपनिवेश समाप्त होने के दोनों ही देशों में लोकतांत्रिक सरकारों का गठन हुआ |
4. वर्मा में भारत की तरह दो संसदीय लोकतंत्र की स्थापना हुई |
भारत और म्यांमार में अंतर :-
1. भारत को स्वतंत्रता मिलने के 5 माह के पश्चात वर्मा को आजादी मिली |
2. आन शान नामक एक वर्मा जाति समूह के नेता के नेतृत्व में म्यांमार को आजादी मिली. 3. म्यांमार में अन्य समूहों और अल्पसंख्यकों को लोकतांत्रिक अधिकार नहीं दिए गए थे |
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प्रश्न 15 : लोकतांत्रिक चुनाव में अन्य जातियों और अल्पसंख्यकों को शामिल करना क्यों जरूरी है?
उत्तर : लोकतंत्र का सही अर्थ ही यही है कि जिस राष्ट्र में लोकतांत्रिक सरकार या संगठन है, वहां प्रत्येक व्यक्ति की सहभागिता को सुनिश्चित किया जाए, यदि राष्ट्र का कोई भी नागरिक चाहे जिस समूह संगठन का हो, यदि वह अल्पसंख्यक भी हो तब भी उसकी जनभागीदारी एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है | क्योंकि लोकतंत्र का सही अर्थ ही लोक में निहित है | इसलिए किसी भी देश, संगठन या संस्था में लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी सफल हो सकती है, जब समाज का प्रत्येक वर्ग, समूह, बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर प्रदान किया जाए |
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प्रश्न 16 : म्यांमार में सैनिक सत्ता किस प्रकार आई?
उत्तर : म्यांमार में जनजातीय अधिकारों से संबंधित जटिल समस्याएं थी | इसका हल मजबूत संस्थाओं और प्रशासनिक ढांचे से ही संभव था | जिसका कि वहां अभाव था | इसी का लाभ उठाकर सेना ने वहां जनजातीय क्षेत्रों पर कब्जा करना शुरू कर दिया और बाद में सेनाध्यक्ष जनरल नेविद सन 1962 में निर्वाचित सरकार का तख्त पलटकर सैन्य शासन की स्थापना किया |
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प्रश्न 17 : म्यांमार के सैनिकों शासकों ने जनता को अपने विश्वास में लेने के लिए क्या- क्या काम किया?
उत्तर : म्यांमार में सैन्य शासक ने जनता का विश्वास प्राप्त करने के लिए, जनता के हित में कई कार्य किए | उन्होंने खनिज खदानों का राष्ट्रीयकरण किया और अन्य जन उपयोगी परियोजनाओं का शुभारंभ किया, किंतु इसका प्रभाव नकारात्मक हुआ, और सेना का सभी सरकारी संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित हो गया |
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प्रश्न 18 : सैनिक शासकों द्वारा खदानों और उद्योगों के राष्ट्रीयकरण के बावजूद म्यांमार में अधिक प्रगति क्यों नहीं हो पाई?
उत्तर : जहां लीबिया में राष्ट्रीयकरण के कारण प्रगति का मार्ग प्रशस्त हुआ, इसके विपरीत म्यांमार में खदानों और कारखानों के राष्ट्रीयकरण का विपरीत परिणाम देखने को मिला, क्योंकि म्यांमार में सेना ने राष्ट्रीयकरण के पीछे अपनी शक्ति को बढ़ाने और जन अधिकारों के हनन का कार्य किया | इसी कारण म्यांमार में राष्ट्रीयकरण के बावजूद कोई प्रगति नहीं हुई | वरन म्यांमार आर्थिक रूप से और कमजोर हो गया |
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प्रश्न 19 : ऑग सान सू की कौन थी? उन्होंने म्यांमार में बदलाव के लिए क्या प्रयास किए?
उत्तर : म्यांमार में अधिकतर प्रदर्शन और विरोध छात्रों द्वारा किए जाते थे | सन् 1988 में छात्रों द्वारा सेना के खिलाफ एक बड़ा प्रदर्शन किया गया, जिसमें सेना ने हिंसा, क्रूरता से बड़ी ही निर्मलता से कुचल दिया | उसी समय म्यांमार में आन सान सू की ने देश में राजनीतिक सुधार के लिए अहिंसात्मक आंदोलन प्रारंभ किया, और मानवाधिकार के लिए म्यांमार के लोगों की आवाज को बुलंद किया, जिसने विश्व समुदाय का ध्यान वहां हो रही सैनिक तानाशाही हिंसा और दमन पर आकृष्ट किया |
आन सान सू की ने एक राजनीतिक दल नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी नामक पार्टी का गठन किया | 1990 के चुनाव में NLD को 80% का भारी बहुमत प्राप्त किया | किंतु सैन्य तानाशाह शासकों ने इसे स्वीकार नहीं किया और आन सान सू की को नजरबंद कर दिया. विश्व के लोकतांत्रिक देशों में म्यांमार की सैन्य सरकार पर दबाव बनाने के लिए राजनैतिक और व्यापारिक संबंध तोड़ लिए |
आन सान सू की ने दिशाहीन आंदोलन को नई दिशा प्रदान किया | उन्होंने यह भी ध्यान दिया कि विरोध प्रदर्शन अहिंसात्मक रहे, जिसमें जान माल की क्षति से बचा जा सके | उन्होंने पूरे म्यांमार को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया | जिस कारण उन्हें नोबेल पुरस्कार से 1991 सम्मानित भी किया गया |
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प्रश्न 20 : नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को चुनाव में 80 प्रतिशत सीट मिलने के बावजूद म्यांमार के सैनिक शासकों ने सरकार क्यों नहीं बनाने दी?
उत्तर : म्यांमार में सन 1988 में एक बड़ा और व्यापक जन प्रदर्शन हुआ, जिसके दबाव में वहां के सैन्य शासकों ने सन् 1990 में चुनाव की घोषणा किया | इस चुनाव में आन सान सू की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को भारी बहुमत प्राप्त हुआ | इसे लगभग 80% जनसमर्थन मिला, जबकि इस पार्टी की नेता आन सान सू की जेल में थी, और इस जनसमर्थन के बावजूद सेना शासकों ने उन्हें जेल से रिहा करने और सरकार बनाने की अनुमति प्रदान नहीं की, क्योंकि उन्हें यह भय था कि आम जन समर्थन कि यदि सरकार बनती है तो सेना का प्रभाव कम हो जाएगा | इसी सब कारणों से आन सान सू की को जेल में रिहा कर उन्हें घर में नजरबंद कर दिया गया, और एक बार पुनः सैन्य शासकों ने लोकतंत्र की हत्या किया।
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प्रश्न 21 : अंतरराष्ट्रीय आर्थिक क्रियाएँ किस प्रकार शासन को प्रभावित करती है?
उत्तर : किसी भी देश की शासन प्रणाली को बहुत से कारण प्रभावित करते हैं, जिसमें एक महत्वपूर्ण कारण अंतरराष्ट्रीय समन्वय होता है | क्योंकि इसी के माध्यम से एक देश दूसरे देश में राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक, कूटनीति, तथा अन्य तरह के संबंध रखता है | यदि किसी देश में किसी प्रकार का अलोकतांत्रिक कार्य हो रहा है और वहां की जनता के मूलभूत अधिकारों का हनन होता है, तब अंतरराष्ट्रीय ताकते वहां पर कई तरह से प्रतिबंध लगाकर उस देश की शासन प्रणाली पर उन्हें रोकने और सुधार करने के लिए दबाव बनाते हैं, अर्थात हम कह सकते हैं कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक क्रियाएँ किसी भी देश की शासन प्रणाली को बहुत प्रभावित करती हैं, क्योंकि इनके सकारात्मक योगदान के बगैर उस देश की शासन प्रणाली और निष्क्रिय हो जाती है ,और विश्व , समुदाय से मिलने वाला सहयोग और सहायता प्रभावित होता है।
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प्रश्न 22 : विश्व के लोकतांत्रिक देशों द्वारा म्यांमार पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबन्ध का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर : लोकतांत्रिक देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण म्यांमार की हालत और भी खराब हो गई, उसका विश्व के अन्य देशों से व्यापारिक, आर्थिक संबंध टूट गया | म्यांमार और विश्व के किसी देश से किसी प्रकार का विनिमय नहीं कर सकता था, जिससे वहां के सैन्य शासकों पर बहुत दबाव पड़ा और उन्हें इस अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दबाव में अपने शासन प्रणाली में अनेक सुधार करने पड़े, जिसका लाभ म्यांमार की जनता को प्राप्त हुआ।
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प्रश्न 23 : सन् 2008 के बाद म्यांमार के सैनिक शासकों ने अपनी नीति में मुख्य रूप से कौन – कौन से बदलाव किए?
उत्तर : 2008 में म्यांमार की सैनिक सरकार को जनता के विद्रोह और अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर कई महत्वपूर्ण बदलाव करने पड़े. जैसे कि लोकतंत्र की स्थापना और पुनर्गठन के लिए जनमत संग्रह का आदेश दिया, किंतु जनमत संग्रह नहीं करवाया गया, देश का नाम बदलकर वर्मा कर दिया गया, सन् 2010 में संयुक्त राष्ट्र संघ की देखरेख में चुनाव हुए जिसमें आंग सान सू और उनकी पार्टी NLD को चुनाव में भाग नहीं लेने दिया गया| आंग सान सू को चुनाव के दौरान नजरबंद रखा गया, चुनाव के परिणाम में अन्य पार्टी यूनियन सॉलिडैरिटी एण्ड डेवलपमेंट पार्टी ने चुनाव जीता, किन्तु इस पर सेना का नियंत्रण था। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सरकार को मान्यता नहीं दिया | सन 2011 में उपचुनाव हुए, जिसमें NLD पार्टी में चुनाव में भाग लिया और 43 सीटों पर विजय प्राप्त किया | सू का आजाद होना म्यांमार के लिए अच्छे संकेत थे | आम चुनाव में NLD की सू को बहुमत प्राप्त हुआ और वे दोनों में विजई रहे | 1916 श्रीक्याय के शपथ ग्रहण से म्यांयार में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को और मजबूत और सुदृढ़ हुई।
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प्रश्न 24 : सन् 2010 के बाद म्यांमार के सैनिक शासकों ने आंग सान सू की व उनके राजनैतिक दल एन .एल .डी को सत्ता में आने से रोकने के लिए क्या प्रयास किया?
उत्तर : सन 1988 के विद्रोह के बाद हुए चुनाव में आंग सान सू की पार्टी NLD को भारी बहुमत प्राप्त हुआ, जिसके कारण म्यांमार की सेना सरकार डरी हुई थी | सैन्य शासक ने आंग सान सू की को सत्ता से दूर रखने के लिए 2010 में हुए चुनाव से दूर रखने के लिए उन्हें चुनाव के दौरान जेल में बंद कर दिया गया ,और उनकी पार्टी को भी चुनाव में भाग लेने से रोक दिया | किंतु 2011 में हुए उपचुनाव में NLD पार्टी में भाग लिया और 45 में से 40 सीटों पर विजय प्राप्त कर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया | जिसके बाद सैन्य शासकों को उन्हें रिहा करना पड़ा और 2015 के चुनाव में आन सान सू की पार्टी में दोनों सदनों में भारी बहुमत प्राप्त किया।
अभ्यास :
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प्रश्न 01 सही विकल्प चुनिए –
1 . लीबिया के राजा थे ?
क . इदरिस
ख . मुसोलिनी
ग . कर्नल गद्दाफी
घ . आगं सान |
2 . लीबिया में विद्रोह किस शहर से प्रारम्भ हुआ?
क . ट्रिपोली
ख . बेनगाजी
ग . अल बायरा
घ . रंगून
3 . लीबिया में सन 2010 की जनगणना के अनुसार साक्षरता का प्रतिशत कितना है?
क . 50
ख . 70
ग . 80
घ . 90
4 . म्यांमार में लोकतंत्र का तख्तापलट कर कौन शासक बने?
क . आंग सान
ख . नेविन
ग . आंग सान सू
घ . थेंन सेन
5 . आंग सान सू की को किस क्षेत्र में कार्य करने के लिए नोबेल पुरस्कार मिला?
क . साहित्य
ख . शांति
ग . समाज सेवा
घ . चिकित्सा
उत्तर : i) क . इदरिस, ii) ग . अल बायरा, iii) घ . 90, iv) ख . नेविन, v) ख . शांति
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प्रश्न 02 : खाली स्थान भरें –
1 . लीबिया उत्तरी अफ्रीका का एक ———– देश था |
2 . वर्तमान में म्यांमार के राष्ट्रपति ———– है |
3 . लीबिया की जनता मुख्यतः कृषि और ————-का कार्य करती थी |
4 . म्यांमार ——– देश का उपनिवेश था |
5 . म्यांमार में किसानों को अपनी संतानों को —— सेना को बेचना पड़ता था |
6 . म्यांमार के प्रथम राष्ट्रपति का नाम ——– तथा प्रथम प्रधानमंत्री का नाम ——- है |
उत्तर : i) निर्धन, ii) थेन सेन , iii) पशुपालन, iv) इटली , v) सेना |
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प्रश्न 03 : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए –
प्रश्न 01 : सन् 2011 में लीबिया में विरोध प्रदर्शन क्यों हुआ?
उत्तर : 2011 में लीबिया में व्याप्त भ्रष्टाचार और आवास योजना में हो रही देरी के कारण अल वायदा शहर में विरोध प्रदर्शन हुए।
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प्रश्न 02 : लीबिया व म्यांमार की जनता की कठिनाइयों में से कौन – कौन से कष्ट व अत्याचार की कठिनाइयाँ वर्तमान भारत में जनता या आपको अनुभव होती है? सूची बनाइए |
उत्तर : लीबिया और म्यांमार में जनता का बहुत शोषण होता था, उनकी अपेक्षा भारत की स्थिति बहुत बेहतर है, फिर भी कुछ क्षेत्रों में कठिनाइयां हैं :-
1.सरकारी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार
2. क्षेत्र विशेष को प्राथमिकता
3. जातिवाद और क्षेत्रवाद
4. आर्थिक विषमताएं
5. रोजगार तथा अवसरों की कमी।।
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प्रश्न 03 : शहरीकरण का लीबिया को जनता पर क्या – क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर : लीबिया के लोग पहले कबिलाई जीवन यापन करते थे | यहां का समाज कबिलाई समुदायों में बंटा हुआ था और आपस में परस्पर संघर्ष और हिंसा होती रहती थी | यहां का जीवन एक जगह स्थाई नहीं था, ये घुमंतू जीवन यापन करते थे | परंतु लीबिया का विकास और शहरीकरण होने से यहां के निवासियों को इन सब समस्याओं से मुक्ति मिली और वे सुव्यवस्थित सामाजिक जीवन यापन करने लगे।
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प्रश्न 04 : लीबिया में गद्दाफी शासन के विरुद्ध आंदोलन में आम जनता के अतिरिक्त किन – किन लोगों ने भाग लिया?
उत्तर : जब गद्दाफी में विद्रोह का दमन करने के लिए अपने ही नागरिकों पर अमानवीय क्रूर तरीके से सैनिक कार्यवाही करने लगे तथा संयुक्त राष्ट्र संघ और नाटो (अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन) ने वहां की आम जनता का साथ दिया | और गद्दाफी का शासन खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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प्रश्न 05 : म्यांमार में सैनिक शासक नागरिकों पर कौन – कौन से अत्याचार कर रहे थे?
उत्तर : सैन्य शासकों ने म्यांमार की जनता पर बहुत से अत्याचार किए जिसमें प्रमुख निम्नलिखित है :-
1. म्यांमार की जनता के सभी मूल अधिकार छीन लिए गए थे |
2. म्यांमार की जनता को जबरदस्ती अपने बच्चों को सेना को बेचना पड़ता था |
3. नागरिकों को अपने घरों से बेदखल कर दूसरे स्थानों पर भेज दिया गया |
4. श्रमिकों को सिर्फ जोर जबरदस्ती से सेना कार्य करवाती थी, और बाल श्रमिकों पर अत्याचार करती थी |
5. महिलाओं और लड़कियों पर अत्याचार और शोषण की घटनाएं आम थी।
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प्रश्न 06 : सू की को नजरबंद क्यों रखा गया था?
उत्तर : भारत में 1990 के चुनाव में राजनीतिक नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को 80% जनता का भारी समर्थन मिला , जिसकी नेता आन सान सू की थी | तब म्यामांर कि सैन्य तानाशाह सरकार उससे डर गई, और लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को रोकने के लिए सू को नजरबंद रखा गया, और उन पर सेना द्वारा अनेक भ्रष्टाचार के झूठे आरोप भी लगाए गए।
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प्रश्न 07 : गद्दाफी द्वारा आर्थिक , सामाजिक उन्नति करने के बाद भी विद्रोह क्यों हुआ?
उत्तर : गद्दाफी शासन में लीबिया की प्रगति तो हुई, किंतु वहां की आम जनता अपने आप को स्वतंत्र नहीं महसूस करती थी| वहां पर हर सरकारी और गैर सरकारी संस्था पर आखिरी निर्णय गद्दाफी और उसकी सरकार का होता था | वहां सरकार द्वारा किए गए भ्रष्टाचार और क्षेत्रीय भेदभाव से जनता त्रस्त व परेशान हो गई थी, इसी कारण वहां विद्रोह हुआ।
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प्रश्न 08 : म्यांमार में अमेरिका ने दखल क्यों नहीं दिया?
उत्तर : म्यांमार की परिस्थितियां लीबिया जैसे हिंसक और सामूहिक दमनकारी नहीं थी जबकि दोनों ही जगह विद्रोह का मूल उद्देश्य लोकतांत्रिक सरकार का गठन ही था | किंतु म्यांमार में केवल आर्थिक प्रतिबंध और संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से ही स्थितियों में काफी सुधार हुआ, इसलिए म्यांमार में अमेरिका ने प्रत्यक्ष रूप से कोई कार्यवाही नहीं किया, जो भी कार्यवाही हुई वह संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में ही की गई।
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प्रश्न 09 : म्यांमार में स्वतंत्रता के बाद भी लोकतंत्र सफल क्यों नहीं हुआ?
उत्तर : म्यांमार में जनजातीय अधिकारों से संबंधित अनेक जटिल समस्याएं थी, क्योंकि यहां का जन समुदाय जनजाति समूह में बंटा हुआ था, उन्हें एक देश के तौर पर एकत्र करने के लिए मजबूत संस्थाओं वाले प्रशासनिक ढांचे की जरूरत थी, जो कि म्यांमार में ही नहीं था | इसी कारण म्यांमार में स्वतंत्रता के बाद भी लोकतंत्र सफल नहीं हो सका।
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प्रश्न 10 : अमेरिका , फ्रांस एवं ब्रिटेन ने लीबिया पर आक्रमण क्यों किया?
उत्तर : गद्दाफी ने विद्रोह रोकने के लिए युद्ध की घोषणा कर दिया और लीबिया में गृह युद्ध शुरू हो गया | गद्दाफी और उसकी सेना द्वारा विद्रोह को कुचलने के लिए वहां के नागरिकों को सामूहिक रूप से मारना शुरू कर दिया, विद्रोहियों की मदद और मानवता के कारण अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन को गद्दाफी पर आक्रमण करना पड़ा और विद्रोहियों की मदद के लिए उन्हें सैन्य समान और अन्य सहायता उपलब्ध करवानी पड़ी।
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प्रश्न 11 : लीबिया एवं म्यांमार के सैनिक शासन में क्या अंतर है?
उत्तर : म्यांमार और लीबिया में सैनिक शासन द्वारा किए गए कल्याण कार्यों में निम्नलिखित अंतर देखने को प्राप्त होते हैं :-
1.लीबिया में किए गए जन कल्याण कार्यक्रमों से वहां प्रगति और विकास हुआ, जबकि म्यांमार में सुधार कार्यक्रमों से वहां की जनता की हालत और खराब हो गई |
2. लीबिया में सैन्य सरकार ने वहां के लोगों के रहने और रोजगार के लिए अनेक कार्यक्रम जैसे शहरीकरण, रोजगार की उपलब्धता, खाद्यान्न का वितरण, खेती में सुविधाएं, जैसे कार्यक्रम चलाए | इसके विपरीत म्यांमार के सैन्य शासकों ने यहां के किसानों का शोषण किया, उन्हें उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया।
3. लीबिया में बच्चों और महिलाओं को मुफ्त स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं शासन की ओर से मुफ्त में उपलब्ध थी, जबकि म्यांमार में सैन्य शासकों द्वारा महिलाओं और बच्चों का शोषण किया जाता था, और किसानों को मजबूर किया जाता था कि वे अपने बच्चों को सेना के हाथों में बेच दे।
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प्रश्न 12 : लीबिया में स्वतंत्रता के बाद भी लोकतंत्र की स्थापना क्यों नहीं हो सकी? अपने विचार दीजिए |
उत्तर : औपनिवेशिक शासन से लीबिया की आजादी के बाद वहां की सत्ता की बागडोर राजा इदरिस के हाथों में आ गई, इसका प्रमुख कारण था कि वहां की सामाजिक व्यवस्था. लीबिया की अधिकांश जनता कबिलाई समुदायों में बंटी हुई थी और कबीले का मुखिया ही उसके सारे निर्णय लेता था, चूंकि उस समय लोकतंत्र में विश्वास नहीं था और आपसी मतभेद के कारण ये एक साथ रहकर संघर्ष नहीं कर सके और यहां की जनता के आपसी एकता ना होने के कारण ही देश में लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो सकी।
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प्रश्न 13 : म्यांमार एवं लीबिया के सैनिक शासन द्वारा जन कल्याण के लिए किए गए कार्यों में क्या – क्या अंतर है?
उत्तर : लीबिया :- यहां के सैन्य शासकों द्वारा जनता के हित के लिए कई कार्यक्रम चलाए गए, जिसमें प्रमुख रूप से लीबिया का विकास और शहरीकरण, स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएं, किसानों की खेती हेतु जमीन आदि उपलब्ध कराना, महिलाओं को हर क्षेत्र में पुरुषों के समान अधिकार मिलना आदि जैसी प्रमुख कार्यक्रम थे, जिससे लीबिया का तेजी से विकास हुआ है | यहां के तेल और गैस भंडार का राष्ट्रीयकरण किया गया, जिससे प्रत्येक नागरिक की जन भागीदारी को सुनिश्चित किया जा सके |
म्यांमार :- म्यांमार में जन सुधार के कार्यक्रम सैन्य शासकों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण हुए | परंतु यहां पर खनिज संपदाओं का राष्ट्रीयकरण करने से हालत और भी बदतर हो गए | किसानों की हालत और दयनीय होती चली गई | उन्हें मजबूर करके अपने बच्चों को सैन्य शासकों को बेचना पड़ता था | नागरिकों को बेदखल करके उन्हें अन्य स्थानों पर भेज दिया गया, यहां सेना द्वारा सुधार कार्यक्रम कम किया गया और अपने ही नागरिकों का मानवाधिकार का हनन ज्यादा किया गया |
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प्रश्न 14 : म्यांमार में आंग सान सू की का लोकतंत्र की स्थापना के संघर्ष में क्या योगदान है?
उत्तर : सन 1988 में छात्रों के द्वारा म्यांमार में बहुत बड़ा विरोध प्रदर्शन किया गया, जिसमें आन सान सू की ने एक बड़े समुदाय का बहुत सफलता से नेतृत्व किया, किंतु सेना द्वारा इस प्रदर्शन को बड़ी निर्ममता से कुचल दिया गया और हजारों की संख्या में छात्र और आम आदमी मारे गए | इस प्रदर्शन में सू की नेतृत्व की क्षमता ने सब को प्रभावित किया, और 1990 में हुए आम चुनाव ने सू की पार्टी NLD को अपार बहुमत प्राप्त किया | आन सान सू की ने म्यांमार में हो रहे मानव अधिकार की ओर विश्व समुदाय का ध्यान आकृष्ट किया. सू के कारण ही म्यांमार की जनता एकता के साथ खड़ी होकर, सैन्य सरकार का विरोध किया | आन सान सू की ने म्यांमार की जनता को संगठित होकर लड़ने का मंत्र दिया, जिससे वहां होने वाले विरोध प्रदर्शनों को एक नई दिशा प्रदान किया | उन्होंने वहां होने वाले आंदोलनों और प्रदर्शनों को अहिंसक बनाया, जिससे जन धन के नुकसान को बचाया जा सका | आन सान सू की लगातार वर्षों तक जेल में रहे और उन्हीं के कारण 2015 के आम चुनाव में लोकतांत्रिक सरकार का गठन संभव हो सका |
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प्रश्न 15 : साक्षरता एवं जन संचार माध्यमों की लोकतंत्र के विषय में जागरूकता पैदा करने में क्या भूमिका हो सकती है?
उत्तर : आज के इस आधुनिक और इंटरनेट की युग में साक्षरता और संचार माध्यम किसी भी देश की रीढ़ की हड्डी साबित होती है | क्योंकि यदि किसी भी देश की जनता या समुदाय में साक्षरता और संचार माध्यम का अभाव है, तो वह प्रगति के इस युग में बहुत पीछे छूट जाएगी | क्योंकि संचार क्षेत्र में हुई क्रांति ने पूरे विश्व को एक सूत्र में बांध दिया है | किसी भी देश या दुनिया में होने वाली घटनाओं की क्रिया प्रतिक्रिया पूरे विश्व में देखने को मिलती है, लोकतांत्रिक देशों में मिलने वाले अधिकारों और सुविधाएं विश्व के प्रत्येक देश में संचारित होती है, और जहां ऐसी व्यवस्था नहीं है, वहां साक्षरता और संचार के माध्यम है तो उस देश या समुदाय के लोग भी जागरूक होकर अपने अधिकारों की मांग करते हैं | जैसा कि हमें लीबिया में देखने को मिला है | इसलिए हम यह कह सकते हैं कि साक्षरता और संचार लोकतांत्रिक अधिकारों को प्राप्त करने में बहुत ही सहायक सिद्ध हुए हैं | इसे हम आधार स्तंभ कह सकते हैं |
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प्रश्न 16 : सन 1990 के चुनाव परिणामों को म्यांमार के सैन्य शासन ने स्वीकार क्यों नहीं किया?
उत्तर : म्यांमार में सन 1988 में एक बड़ा और व्यापक जन प्रदर्शन हुआ, जिसके दबाव में वहां के सैन्य शासकों ने सन् 1990 में चुनाव की घोषणा किया | इस चुनाव में आन सान सू की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को भारी बहुमत प्राप्त हुआ | इसे लगभग 80% जनसमर्थन मिला, जबकि इस पार्टी की नेता आन सान सू की जेल में थी, और इस जनसमर्थन के बावजूद सेना शासकों ने उन्हें जेल से रिहा करने और सरकार बनाने की अनुमति प्रदान की, क्योंकि उन्हें यह भय था कि आम जन समर्थन कि यदि सरकार बनती है तो सेना का प्रभाव कम हो जाएगा | इसी सब कारणों से आन सान सू की को जेल में रिहा कर उन्हें घर में नजरबंद कर दिया गया, और एक बार पुनः सैन्य शासको ने लोकतंत्र की हत्या किया।