CG Board Class 9 SST Solutions Chapter 6 यूरोप और भारत में आधुनिक संस्कृति का उदय – CGBSE Solutions PDF in Hindi

CG Board Class 9 SST Solutions Chapter 6 यूरोप और भारत में आधुनिक संस्कृति का उदय are given below for Hindi Medium Students.

CG Board Class 9 SST Solutions Chapter 6 यूरोप और भारत में आधुनिक संस्कृति का उदय


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प्रश्न 01 :  सन् 1400 में किन – किन चीजों व विचारों का आदान –  प्रदान होता रहा होगा? अंदाजा लगाएं | 

उत्तर : सन् 1400 साल के उस दौर में यूरोप उत्तरी अफ्रीका और एशिया के बीच में व्यापार में बहुत तेजी आई होगी | विभिन्न देशों में भी व्यापार का विस्तार हुआ होगा, और तरह-तरह के सामानों का आदान-प्रदान होने लगा होगा | व्यापार के विकास के साथ-साथ तीनों महाद्वीपों में शहरीकरण बड़ा, जिससे नए शहर बसे और पुराने शहरों का विस्तार हुआ | इसके कई परिणाम हुए होंगे, धनी व्यापारियों का वर्ग उभरा होगा, देशों के बीच लोगों का आवागमन बड़ा होगा, जिससे विचारों का आदान-प्रदान होने लगा, नए नए आविष्कार हुए और नई तकनीकों का एक स्थान पर फैलाव हुआ | इस समय खोज एवं तकनीकि के साधनों पर यूरोप में राजकीय हस्तक्षेप सबसे कम था, भारत में राजकीय हस्तक्षेप अधिक था | 

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प्रश्न 02 : कई लोगों का कहना है कि आज राज्य के पास मुगलों की केंद्रीकृत शासन प्रणाली की तुलना में कई गुना अधिक शक्ति व अधिकार है | क्या आप इस कथन से सहमत है? अपने कथन के पक्ष में तर्क दीजिए | 

उत्तर : हाँ हम इस कथन से पूर्णरूपेण सहमत हैं कि आज राज्य के पास मुगलों की केंद्रीकृत शासन प्रणाली की तुलना में कई गुना आर्थिक शक्ति व अधिकार है | क्योंकि हमारे देश की शासन प्रणाली विकेंद्रीकृत है, इसलिए राज्यों के पास था सत्ता और ताकत है, परंतु मुगलकालीन शासन व्यवस्था अत्यधिक केंद्रीकृत नौकरशाही व्यवस्था थी। मुगलों, सम्राटों को प्रशासन की गतिविधियों को भली-भाँति संचालित करने के लिए एक मंत्रिपरिषद की आवश्यकता होती थी। परन्तु आज के इस दौर में जितना सक्षम प्रशासनिक तंत्र सरकार के पास है, उतना मुगल शासकों के पास नहीं था। आज के शासन तंत्र में जितने तीव्र साधन एवं तकनीकी आज सरकार के पास है, उतनी मुगलों के समय नहीं थी । जैसे :- यातायात के साधन, संचार के साधन आदि,  अर्थात मुगल शासकों के समय ऐसी सुविधाएं भी नहीं थी।

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प्रश्न 03 : प्राचीन ग्रीक और लेटिन साहित्य के अध्ययन के प्रति वर्ष का क्या दृष्टिकोण था? इसके पीछे उसकी क्या मान्यताएं  थी? 

उत्तर : मध्यकाल में जब ईसाई धर्म का वर्चस्व यूरोप में स्थापित हुआ तो उसका धर्म गुरुओं के द्वारा प्राचीन ग्रीक और लैटिन साहित्य की आलोचना की गई जिसके कारण मध्यकालीन यूरोप में प्राचीन ग्रीक और लैटिन साहित्य का अध्ययन ईसाई चर्च के प्रभाव के कारण बहुत सीमित हो गया। यह साहित्य ईसा मसीह के जन्म के पहले रचा गया था और ईसाई धर्म के अनुरूप नहीं था। चर्च का आग्रह था कि इस लोक में सुख प्राप्ति की चिन्ता न करके परलोक में स्वर्ग प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए।चर्च के विरोध के चलते ये प्राचीन साहित्य पश्चिमी यूरोप में लुप्त होते गए, किन्तु ईरान, इराक आदि इस्लामी देशों में ग्रीक और लैटिन साहित्य का अनुवाद और अध्ययन चलता रहा।

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प्रश्न 04 : प्राचीन यूनानी साहित्य के कोन – कोन से विषय थे? उनकी सूची बनाएं |

उत्तर : प्राचीन यूनानी साहित्य में मुख्यतः राजनीति शास्त्र, नीतिशास्त्र, दर्शन, कानून, सुसंस्कृत व्यवहार और भौतिक दुनिया का अध्ययन आदि प्रमुख विषय था । कई मायनों में यह सब धार्मिक चिन्तन से हटकर था। इनमें किसी धर्म ग्रन्थ या धर्म गुरु में विश्वास पारलौकिक पुण्य के लिए इस लोक में त्याग, तपस्या या कष्ट सहना आदि बातों पर जोर नहीं था।

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प्रश्न 05 : क्या आप बता सकते है की शहरीकरण और नए राज्यों के बनने से किस तरह के व्यवसाय व काम विकसित हुए होंगे?

उत्तर : व्यापार और शहरों के विकास तथा केन्द्रीकृत राज्यों के विकास का एक परिणाम यह हुआ कि इन देशों में एक नया मध्यम वर्ग उभरकर सामने आया, जिसके अन्तर्गत व्यापारी धनी कारीगर मुंशी लिपिक वकील पेशेवर कलाकार कवि लेखक आदि सम्मिलित थे। शहरीकरण और राज्यों के विकास के कारण जो नए-नए काम उभरे अर्थात् विकसित हुए उनमें हिसाब-किताब रखना प्रशासन कर वसूली न्यायालयीन काम राज्यों के बीच दूत का काम आदि थे। नए मध्यम वर्ग के लोग लगातार आर्थिक तंगी में रहते थे और अच्छी नौकरी की खोज में दूर-दराज के राज्यों में जाकर रहने के लिए तैयार होते थे।इस तरह बड़े क्षेत्र में विचरण करने के कारण यह वर्ग समालोचनात्मक दृष्टि रखता था। और तत्कालीन धर्मगुरू या शासकों की आलोचना करने से कतराता नहीं था।

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प्रश्न 06 : व्यापार से मुनाफा कमाने , राजा के शक्तिशाली बनने जैसी बातों से लोगों को किस तरह की परेशानी हो सकती थी? 

उत्तर : शासक बहुत महत्वाकांक्षी थे और वे राज्य के अन्दर शक्ति का केन्द्रीकरण कर रहे थे, अर्थात् एक राजा या बादशाह के हाथों में सत्ता अधिकार और धन इकट्ठा होने लगा। व्यापार से मुनाफा कमाने से व्यापारी वर्ग बहुत धनी होने लगा और शहरों में पूँजी कुछ लोगों के पास एकत्रित होने लगी जिसके कारण पूँजीपति वर्ग ने कमजोर वर्ग यानि मजदूरों पर शोषण आरंभ कर दिया जिससे समाज में बड़ा वर्ग संघर्ष जैसी स्थिति पैदा हो गयी। मुनाफे के लिए कालाबाजारी कृत्रिम अभाव और भ्रष्टाचार जैसी परेशानी हो गई थी। राजा के शक्तिशाली बनने से उनमें निरंकुश प्रवृत्ति का विकास होने लगा और निरंकुश प्रवृत्ति का विकास होने लगा और निरंकुश शासक जनता पर अत्याचार करने लगा अर्थात् राजाओं की शक्ति बढ़ने से जनता को परेशानी होने लगी। 

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प्रश्न 07 : आप मानववाद के कुछ प्रमुख पहलुओं की सूची बनाइए |

उत्तर : मध्यकालीन अध्ययन धार्मिक मामलों पर केंद्रित थे और कोई विद्वान यह हिम्मत नहीं कर सकता था कि वह धार्मिक विचारों के विरुद्ध लिखे या बोले, लेकिन अब अध्ययन  मनुष्य के आम जीवन से जुड़ी बातों पर केंद्रित होने लगे | 14 वीं सदी में मानववाद का विकास धीरे-धीरे होने लगा था। इसके तहत प्राचीन लैटिन साहित्य के अध्ययन पर जोर दिया गया । लोगों के व्यक्तिगत कौशल को विकसित करने के लिए शिक्षा और साहित्य का सहारा लिया गया। प्राचीन साहित्य के अध्ययन से मानववाद शुरू हुआ था, जिससे अपनी अभिव्यक्ति और चिन्तन को प्रभावी और सुसंस्कृत किया जा सके। देखते ही देखते वह चर्च के विरुद्ध हो गया। इस आन्दोलन के स्थायी प्रभावों में उदार  साहित्यिक शिक्षा और बुद्धिजीवियों की स्वतंत्रता ही महत्वपूर्ण बातें हैं।

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प्रश्न 08 : मानविकी अध्ययन आंदोलन का जनक किसे माना जाता है? उन्हें किस बात की चिंता थी? 

उत्तर : लैटिन भाषा के विद्वान इटली के फ्रांसेस्को पेट्रार्क को मानविकी अध्ययन आंदोलन का जनक माना जाता है | उन्हें इस बात की चिंता थी कि उनके समय के लोग भाषा का सही प्रयोग नहीं करते हैं | प्राचीन पुस्तकों को पढ़ने से वह समझने लगे कि उनकी मदद से हम सही भाषा के अलावा अपनी बुद्धि को सही तरीके से सोचकर दुनिया को बेहतर समझने के लिए तैयार कर सकते हैं | पेट्रार्क जैसे लोगों के प्रयासों से 15 वीं और 16 वीं सदी में यूरोप में ग्रीक और लैटिन साहित्य का अध्ययन तेजी से फैला |

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प्रश्न 09 : मानववादी अध्ययन के क्षेत्र में महिलाओं की क्या भूमिका थी? 

उत्तर : उन दिनों आमतौर पर पुरुषों को ही औपचारिक शिक्षा दी जाती थी | महिलाओं से अपेक्षा थी कि वह घर के कामकाज को संभाले, लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी भी थी जिन्होंने इस सीमा को लांघा और ग्रीक व लैटिन साहित्य का अध्ययन किया, और मानववादी लेखकों में अपना नाम दर्ज किया | ऐसी ही एक महिला थी “कसान्ड्रा फेडेले” ने आग्रह किया कि महिलाओं को भी इस तरह की साहित्यिक अध्ययन में भाग लेना चाहिए | उन दिनों में वेनिस एक गणतंत्र था, लेकिन उसमें महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में भाग लेने की अनुमति नहीं थी | फेडेले ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि इससे स्वतंत्रता और लोकतंत्र सीमित होता है, और पुरुषों की इच्छाओं को प्राथमिकता मिलती है | इस तरह से यह पुरुष प्रधान व्यवस्था की शुरुआती आलोचना थी, इससे आने वाले समय में नारीवादी विचारों के उभरने का रास्ता खुला |

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प्रश्न 10 : मैक्यावेली   ने किस विषय पर किताब लिखी? 

उत्तर : मैक्यावेली ने सन् 1513 में एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित की, जिसका नाम था “द प्रिंस “| यह मूलतः राजनीति का एक अध्ययन था | इसकी विशेषता यह थी कि इसमें किसी आदर्शवाद की चर्चा न होकर, यथार्थ में आज जो राजनीतिक प्रक्रियाएँ चल रही थी, उनकी विवेचना थी | इसमें नैतिकता की चिंताओं से मुक्त होकर कोई राजा किस प्रकार निरंकुशता अर्जित कर सकता है, इसका वर्णन मिलता है |

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प्रश्न 11 : छपाई प्रेस का आविष्कार मानविकी अध्ययन के लिए किस तरह सहायक था? 

उत्तर : जर्मन कारीगर गुटनबर्ग की यह सन् 1439 में बनी छपाई प्रेस के अविष्कार से बहुत मदद मिली जिसमे एक किताब की सैकड़ो प्रतियां आसानी से तैयार की जा सकती थी |  फलस्वरूप नई पुरानी पुस्तकों की प्रतियां बहुत बड़ी मात्रा में दूर – दूर तक पहुँच सकती थी| इसमें विव्दानों के बीच संवाद और विचारो का आदान – प्रदान बहुत सरल हो गया | 

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प्रश्न 12 : क्या आपको लगता है की बुद्धिजीवियों को स्वतंत्रता के साथ समाज की विवेचना करनी चाहिए या शासन या समाज द्वारा निर्धारित सीमाओं के अंदर ही काम करना चाहिए? तर्क सहित अपने विचार रखे | 

उत्तर : बुद्धिजीवियों को समाज की विवेचना स्वतंत्रतापूर्वक इस अर्थ में करनी चाहिए ताकि किसी वर्ग विशेष के साथ भेदभाव न हो, यानी बुद्धिजीवियों को बिना किसी पूर्वाग्रह के समाज में सभी की सही स्थिति की विवेचना करना चाहिए, ताकि लोगों के सामने यथार्थ स्थिति आ सके | कुछ हद तक शासन वह समाज द्वारा निर्धारित सीमाओं का पालन करना भी बुद्धिजीवियों के लिए आवश्यक है यदि इस पर कोई सीमा नहीं होगी तो बुद्धिजीवियों के नाम पर कोई समाज को समाज की विवेचना इस प्रकार से कर सकता है जो सामाजिक मर्यादाओं के अनुकूल न हो | अतः शासन व समाज द्वारा निर्धारित सीमाओं का पालन भी आवश्यक है।

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प्रश्न 13 : यूरोप के बुद्धिजीवियों को नए विचारों की खोज में प्राचीन साहित्य की मदद क्यों लेनी पड़ी? 

उत्तर : अभिव्यक्ति और चिंतन को प्रभावशाली बनाने के लिए नए विचारों की खोज में प्राचीन साहित्य की मदद यूरोप के बुद्धिजीवियों को लेनी पड़ी | बुद्धिजीवियों का मानना था कि इससे युवाओं में सोचने के तरीके और औपचारिक पत्र लेखन, भाषण देना, किसी न्यायालय में अपना पक्ष प्रस्तुत करना, व्यापार या राजनीतिक मकसद से बातचीत करना, आदि व्यावहारिक कुशलताएं भी विकसित होंगी |

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प्रश्न 14 : पुस्तकों की छपाई का बुद्धिजीवियों की स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव पड़ा? 

उत्तर : पुस्तकों की छपाई का बुद्धिजीवियों तथा विद्वानों के बीच संवाद तथा विचारों का आदान-प्रदान सरल हो गया। इसके अलावा अब बुद्धिजीवी एक ही विषय को अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं को लिखने लगे ताकि जन-सामान्य भी उनके विचारों को ग्रहण कर सकें।

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प्रश्न 15 : आज के युग में छपाई की जगह एक दूसरी तकनीक में ले ली है – वह क्या है और उसका बुद्धिजीवियों की स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव पड़ा है? 

उत्तर : आजकल छपाई की जगह एक और तकनीकी ने ले ली है | वह है इलेक्ट्रॉनिक, मीडिया, लेजर प्रिंटिंग, और इंटरनेट | इसके माध्यम से हम टेलीविजन, इंटरनेट के द्वारा जानकारी और विचारों का आदान प्रदान कर सकते हैं | इस तकनीकी का बुद्धिजीवियों पर यह प्रभाव पड़ा है कि अब टी.वी. या इंटरनेट के माध्यम से बुद्धिजीवी अपने विचारों का स्वतंत्र रूप से आदान-प्रदान कर सकते हैं | इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आम लोगों से भी जुड़ सकते हैं, तथा सभी के विचार और मत जान सकते हैं | 

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प्रश्न 16 : क्या आपको लगता है की कलाकारों को हूबहू यथार्थवादी चित्र बनाने चाहिए? कारण सहित अपने विचार दीजिए |

उत्तर : हाँ हमें लगता है कि कलाकारों को हूबहू यथार्थवादी चित्र बनाने चाहिए | इससे स्थान, व्यक्ति, वस्तु की वास्तविकता की पहचान हो सकती है | कोई भी चित्रकार यदि वह चित्र बनाता है तो उससे लोगों को यथास्थिति का ज्ञान होता है | यदि चित्रों में वास्तविकता नहीं होती तो लोगों को सही ज्ञान नहीं बल्कि गलत ज्ञान होगा | यदि कोई चित्रकार अपने चित्रों के विषय समाज से लेता है तो वह भी यथार्थ नहीं होंगे तथा लोगों को सही जानकारी नहीं मिलेगी |

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प्रश्न 17 : क्या आपने किसी प्रसिद्ध कलाकार द्वारा बनाया गया चित्र या मूर्ति देखी है? अगर हाँ तो उसके बारे में अपनी कक्षा में बताए | क्या वह कलाकार यथार्थवादी था? उसने आप पर क्या प्रभाव छोड़ा? 

उत्तर : हाँ मैंने अपने विद्यालय प्रांगण में बनने वाले दुर्गा देवी की मूर्ति देखी है, इसे माना के बस्ती के कलाकार बनाते हैं | वे यथार्थवादी कलाकार है, बांग्लादेश से शरणार्थी के रूप में आए थे, किंतु उनकी कला को कोई चुनौती नहीं दे सकते |

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प्रश्न 18 : पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगा रही है – यह मानने  में एक सामान्य व्यक्ति को क्या – क्या कठिनाइयों हो सकती है |

उत्तर : पृथ्वी घूमती हुई किसी भी व्यक्ति को प्रतीत नहीं होती | सूर्योदय और सूर्यास्त तो एक निश्चित दिशा में ही होता है | अतः मनुष्य को मानने में परेशानी होती है कि पृथ्वी घूमती है, उसे तो यही लगता है कि सूर्य घूम रहा है, आसमान में चंद्रमा और तारे भी हमें दिशा बदलते हुए दिखाई पड़ते हैं, जिससे मनुष्य को यह भ्रम हो जाता है कि यह सब तो गतिमान है, परंतु पृथ्वी स्थित है |

अभ्यास : 

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प्रश्न 01 : मध्यकाल के अंत में ऐसी क्या बातें हुई जिनके कारण समाज में बदलाव संभव हुआ?

उत्तर :- मध्यकाल के अंत में वह प्रमुख घटनाएं निम्नलिखित थी जिनके कारण समाज में बदलाव संभव हुआ | जैसे कि व्यापार बढ़ने लगा, जिसके कारण लोगों का संपर्क बढ़ा,  बड़े शहरों का उदय हुआ है | यहां विभिन्न प्रकार के विचारों का उदय होने लगा, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग राज नियंत्रण से मुक्त थे | इस कारण दरों, नए विचारों का उदय होने लगा व्यापार और शहरों के विकास होने के कारण नए मध्य वर्ग का उदय हुआ जिसमें व्यापारी, कलाकार, कृषि, लेखक, वकील, कारीगर आदि सम्मिलित थे | यह वर्ग किसी भी वर्ग विशेष की आलोचना करने से भी घबराता नहीं था |

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प्रश्न 02 : केंद्रीकृत राज्य से क्या आशय है? मध्यम वर्ग के बनने में इसकी  क्या भूमिका रही होगी? 

उत्तर :- केंद्रीकृत राज्य में शासक बहुत ही महत्वाकांक्षी थे, और वे राज्य के अंदर शक्ति का केंद्रीकरण कर रहे थे | अर्थात एक राजा या बादशाह के हाथों में सत्ता, अधिकार और धन इकट्ठा होने लगा | परंतु व्यापार और शहरों के विकास में राजा केंद्रीय कृत राज्यों के विकास का एक परिणाम यह हुआ कि इन देशों में एक नया मध्यमवर्ग उभर कर सामने आया अर्थात् शक्तियों के केंद्रीकरण के कारण जमींदारों और सामंतों के अधिकार कम कर दिए गए| परिणाम स्वरुप यह लोग व्यापार तथा अन्य कार्यों में संलग्न हो गए, और मध्यम वर्ग का हिस्सा बने | दूसरा महत्वपूर्ण अंतर यह था की भारतीय मध्यम वर्ग ने गणित या विज्ञान के अध्ययन में रुचि कम दिखाई, जबकि यूरोप में इसे महत्वपूर्ण माना गया | 

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प्रश्न 03 : व्यापार और शहरीकरण ने मध्यम वर्ग के बनने में किस प्रकार सहायता की होगी?

उत्तर : व्यापार और शहरीकरण के कारण प्रशासन बजट, कर, वसूली, न्यायालयीन कार्य, राजदूत, कलाकार, लेखक जैसे लोगों की आवश्यकता पड़ी |  इससे शिक्षित मध्यम वर्ग का जन्म हुआ, विभिन्न देशों में भी व्यापार का विस्तार हुआ, और तरह-तरह के सामानों का लेनदेन होने लगा | नगरों की उन्नति, शिक्षा का प्रसार, शिल्प और कला कौशल के व्यवसायों  से नगरों में मध्यम वर्ग का विकास हुआ |

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प्रश्न 04 : व्यापार और युद्ध ने किस प्रकार विभिन्न देशों के बीच ज्ञान –  विज्ञान के आदान प्रदान में मदद की होगी?  

उत्तर : व्यापार और युद्ध के कारण विचारों का व्यक्तिगत, रहन-सहन, संस्कृति तथा ज्ञान विज्ञान का आदान-प्रदान तेजी से हुआ |

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प्रश्न 05 : यूरोप के प्राचीन साहित्य की क्या विशेषताएं थी? माध्यम काल में उनका अध्ययन क्यों लुप्त हो गया था? 

उत्तर : प्राचीन साहित्य के अंतर्गत यूनानी व लैटिन साहित्य के केंद्र में मनुष्य और उसके जीवन के विभिन्न पहलुओं थे | राजनीति, नीतिशास्त्र, दर्शन, कानून, सुसंस्कृत व्यवहार और भौतिक दुनिया का अध्ययन आदि इसके प्रमुख विषय है | कई मायनों  में यह सब धार्मिक चिंतन से हटकर था | यूरोप का प्राचीन साहित्य पूर्णता धर्म पर आधारित था | तार्किकता कि उसमें कमी थी, इसलिए उसका अध्ययन लुप्त हो गया था | यूरोपी किसी धर्मगुरु की बातों को भी तर्क की कसौटी पर रखने पर जोर दे रहे थे, इसी कारण मध्यकाल में जब ईसाई धर्म का वर्चस्व यूरोप में स्थापित हुआ तो उनके धर्म गुरु के द्वारा प्राचीन ग्रीक और लैटिन साहित्य की आलोचना की गई | चर्च के विरोध के चलते यह प्राचीन साहित्य पश्चिमी यूरोप में लुप्त होते गए, किंतु ईरान, इराक आदि इस्लामी देशों में ग्रीक और लैटिन साहित्य का अनुवाद और अध्ययन चलता रहा  |

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प्रश्न 06 : भारत में बुद्धिजीवियों के विकास पर जाती व्यवस्था का क्या प्रभाव रहा होगा? 

उत्तर :- भारत में जो मध्यमवर्ग उभरा इसमें कई समुदायों के बावजूद कुछ महत्वपूर्ण अंतर थे, एक तो वह था कि भारत में यह वर्ग कुछ विशेष जातियों तक सीमित था | जहां कायस्थ, क्षत्रिय, ब्राह्मण दूसरा महत्वपूर्ण अंतर यह था की भारतीय मध्यम वर्ग ने गणित या विज्ञान के अध्ययन में रुचि कम दिखाई, जाति व्यवस्था में भेदभाव की  प्रतिक्रिया स्वरूप बुद्धिजीवी वर्ग ने अनेक ग्रंथों की रचना की तथा जाति भेद के दोषियों को उन्होंने उजागर किया, सूफी तथा कांति आंदोलन से जुड़े विद्वानों ने भी जाति व्यवस्था पर कड़े प्रहार किए | गुरु नानक, कबीर दास, तुलसीदास जैसे संत कवियों ने भी जाति व्यवस्था पर जमकर प्रहार किया।

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प्रश्न 07 : यूरोप के मानववाद के विज्ञान में इस्लामी देशों के विद्वानों  का क्या योगदान था? 

उत्तर : इस्लामी देशों के विद्वानों द्वारा रचित ग्रंथ और अरबी अनुवाद यूरोप के मानववाद के बनने में सहायक सिद्ध हुए | मध्य काल में जब चर्च के प्रभाव के कारण प्राचीन साहित्य पश्चिम यूरोप में लुप्त हो रहा था, तब इराक आदि इस्लामी देशों में ग्रीक और लैटिन साहित्य का अनुवाद एवं अध्ययन जारी था | 14 वी सदी तक इस्लामी संस्कृति का प्रभाव एशिया में भारत से लेकर यूरोप में स्पेन तक फैला रहा था | इन क्षेत्रों में जैसे चीनी, मध्य एशियाई, भारतीय ईरानी, इराकी ,यूनानी आदि कई संस्कृतियों व सभ्यताओं का मेल मिलाप हो रहा था  | इस्लामी देशों के विद्वानों ने इसका भरपूर फायदा उठाया और चीनी भारतीय ईरानी और यूनानी साहित्य का अरबी और फारसी भाषाओं में अनुवाद करके अध्ययन किया | 14 वी सदी में जब पश्चिमी यूरोप में प्राचीन साहित्य में रुचि फिर से जागृत हुई तब इस्लामी देशों में संरक्षित ग्रंथ और उनके अरबी अनुवाद बहुत काम आए, इसके अलावा प्राचीन भारतीय गणित, खगोल शास्त्र और चीनी विज्ञान का ज्ञान भी यूरोप के विद्वानों को मिला। 

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प्रश्न 08 : यूरोपीय मानववाद और भारतीय मध्यम वर्ग के साहित्यिक  अध्ययन में क्या समानता व् अंतर थे? 

उत्तर : समानता – यूरोपियों ने साहित्य के अध्ययन में स्थानीय भाषाओं को चुना, भारतीय मध्यमवर्ग ने भी साहित्यिक अध्ययन हेतु स्थानीय भाषाओं को ही चुना। यूरोप में विभिन्न भाषाओं के ग्रंथों को अनुवाद किया गया तथा भारत में भी संस्कृत अरबी फारसी आदि साहित्य का एक दूसरे की भाषा में अनुवाद किया गया। 

अन्तर – यूरोपीय मानववादी चर्च और धार्मिक मान्यताओं के विरूद्ध थे जबकि भारतीय मध्यमवर्ग में धर्म से जुड़े साहित्य का भी अध्ययन और अनुवाद किया जाता था।

यूरोपीय माओवादियों छापेखाने का उपयोग किया लेकिन भारत में अब तक छापेखाने का प्रयोग आरंभ नहीं हुआ था। यूरोपीय मानवतावादी राजाओं व शासकों की आलोचना नहीं कर सकते थे। लेकिन भारतीय अध्ययनकर्ता राजाओं पर आश्रित होते थे। पर उनकी स्वतंत्र रूप से आलोचना कर सकते थे। 

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प्रश्न 09 : मानववाद ने चर्च को किस प्रकार की चुनौती दी? 

उत्तर : धार्मिक सोच से हटकर तार्किक सोच को बढ़ावा दिया गया। मानववाद ने बुद्धि और तर्क का प्रयोग कर चर्च की प्राचीन मान्यताओं को गलत सिद्ध कर दिया चर्च पर आश्रित विद्वान भी चर्च की आलोचना करने से पीछे नहीं हटे। इसमें वे दस्तावेज भी शामिल थे। जिनके आधार पर रोमन कैथोलिक चर्च भी यह दावा करता था कि प्राचीन काल में रोमन सम्राटों ने कई राजकीय अधिकार चर्च को दे रखे थे। इस प्रकार मानववादी आलोचनाओं के परिणामस्वरूप यह आन्दोलन चर्च के विरूद्ध हो गया।

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प्रश्न 10 : यूरोप के रेनासाँ की चित्रकला और मूर्तिकला मध्यकालीन कला से किस तरह से भिन्न थी? 

उत्तर : रेनासाँ युग मुख्य रूप से अपनी विशिष्ट चित्रकला और मूर्तिकला के लिए जाना जाता है। परन्तु रेनासाँ की चित्रकला और मूर्तिकला मध्यकाल से काफी भिन्न थी। मध्यकाल के चित्र कला के विषय में काफी सीमित थे जिनमें प्रमुख थे बाइबिल के बातों और सन्तों के चित्र तथा मदर मरियम, शिशु यीशू के चित्र भी देखें जा सकती है। रेनासाँ युग में जीवन चित्रण के अवलोकन के आधार पर चित्र बने। धार्मिक विषय के अतिरिक्त रेनासाँ व सफल पेशेवरों के चित्र भी बनकर तैयार हुए। मानव जीवन के सभी वस्तुओं, भावनाओं, अवस्थाओं तथा मानव शरीर के विभिन्न रूपों को दर्शाया जाने लगा। रंगों में तैलरंगों को चलन प्रारंभ हुआ। इसकी मदद से रंगों के शेड या विभिन्न प्रकार के रंग दिखाए जा सके। 

मोना लिसा चित्र मूर्तिकला में भी यथार्थ चित्रण इस रेनासॉ काल की ही महत्वपूर्ण देन है। लों पिपेता कृति में मानव शरीर भाव और कपड़ों से यथार्थता झलकता है। माइकल ऐंजेलों जैसे कलाकारों ने बहुत ध्यान से मूर्तियों व चित्रों का अंकन प्राचीन विशेषताओं को दर्शाते हुए किया। 

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प्रश्न 11 : कला में यर्थाथवाद से क्या तात्पर्य है? आप किन हिंदी फिल्मों  पर्यायवाची मानते है? कारण सहित समझाए | 

उत्तर : कला में यथार्थवादी ता का जीवंत चित्रण देखने को मिलता है | जिसमें हूबहू चित्रण जो कि जीते जाते लोगों के अवलोकन के आधार पर बनाए जाते थे | तेरहवीं सदी के अंत में इसमें बदलाव होने लगा और नए जीवन चित्रण जीते जागते लोगों के अवलोकन के आधार पर बने | धार्मिक विषयों का चित्रण भी इस प्रकार से किया गया कि मनुष्य जीवन के विभिन्न पहलुओं, भावनाओं, अवस्थाओं तथा मानव शरीर के विभिन्न रूपों को दर्शाया गया. यथार्थवादी कला में चित्र वास्तविक दिखते थे | यानी इनमें इस प्रकार चित्रण किया जाता की पास की चीजों और दूर की चीजों का आभास हो सके |

      मैं उन हिंदी फिल्मों को यथार्थवादी मानती हूं, जिनमें आम लोगों की जीवन की वास्तविक स्थिति को बिना किसी अतिशय के दिखाया गया हो | यथार्थवादी हिंदी फिल्मों के नायक-नायिका बिल्कुल ही सामान्य लोगों की तरह दिखते हैं | इन फिल्मों को देखकर लगता है मानो यह हमारे जीवन की ही कहानी है | अर्थात हमारी सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं को मोती की तरह धागे में इस तरह पिरोया गया है कि मानो वो माला हमारे जीवन की संपूर्णता को जाहिर कर रही हो | भारत में 40 से 60 का दशक हिंदी सिनेमा में यथार्थवाद का स्वर्ण काल माना जा सकता है, क्योंकि इस युग में सत्यजीतरे, विमल राय, मृणाल सेन, चेतन, आनंद और गुरुदत्त तथा वी शांताराम आदि में फिल्मों में अपने समय के समाज को प्रस्तुत किया | हम इन सभी के द्वारा बनाई गई फिल्मों को यथार्थवादी मानते हैं, क्योंकि इसमें कथावस्तु सीधे लोगों के जीवन से जुड़ी स्थितियों और सत्य घटनाओं पर आधारित रहती है |

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प्रश्न 12 : क्या आप मुग़ल चित्रकला को यथाथर्वादि कला मान सकते है? यदि हाँ तो क्यों? और न तो क्यों नहीं | 

उत्तर :  हां हम मानते हैं कि मुगल चित्रकला के विषय अधिकांश या तो पौराणिक कथाओं से संबंध रखते थे या फिर उनका संबंध राजदरबार से होता था | कुछ चित्र इस समय प्रतीकात्मक भी बनाए गए, कुछ चित्रों में लोगों को यथार्थ रूप में अवश्य चित्रित किया गया है ,लेकिन इससे हम मुगलकालीन चित्रकला जो यथार्थवादी चित्रकला नहीं कह सकते  |

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प्रश्न 13 : मुगलकालीन चित्रकला की आप क्या विशेषताएं पहचान पा रहे है – चित्रों में जो  रहा है , उसके आधार पर बताए | 

उत्तर : मुगलकालीन चित्रकला की निम्न विशेषताएं थी :- 

1. जब भारत में मुगलों का शासन स्थापित हुआ तो उन्होंने बहुत से ईरानी कलाकारों को भारत आमंत्रित किया, इन कलाकारों के साथ पारंपरिक भारतीय चित्रकार भी जुड़ गए | 2.इन चित्रों में चटख रंगों का प्रयोग मनुष्य और जानवरों को हुबहू न बनाकर उनके आदर्श रूप को चित्रित किया गया |

3. इनके चित्रों में पौराणिक कथाओं की छवि देखने को मिलती है |

4. इन चित्रों में जटिल रिश्तों को अनेका अनेक लोगों को व्यक्तिगत चित्रण के साथ पेश किया गया है | यह लोग कोई सफल योद्धा या व्यापारी नहीं, अपितु सामान्य ग्रामीण लोग ही हैं |

5.  दरबारी कलाकार बादशाह और दरबार से जुड़ी हुई घटनाओं को चित्रित करते थे।

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प्रश्न 14 : यूरोपीय रेनासाँ वास्तुकला का इस्लामी वास्तुकला की क्या देन थी? 

उत्तर : यूरोपीय रेनासाँ वास्तु कल को इस्लामी वास्तुकला की प्रमुख देन मेहराब और गुम्बद का उपयोग था | यह गुंबद इस्लामी वास्तुकला की देन है | सन् 691 में बना गुम्बद डोम आफद राका इसका  जीता जागता उदाहरण है | गुंबद और मेहराब का नया और अद्वितीय स्वरूप ताजमहल में देख सकते हैं | ताजमहल के गुंबद और मेहराब में भारतीय नक्शा शिप डिजाइन का समावेश है | जब इटली के 14वीं सदी में फिर से प्राचीन यूनानी और रोमन संस्कृति में रुचि जगी तो वहां के वास्तुशिल्पीय ने मेहराब और गुंबद का उपयोग फिर से शुरू किया | इसमें उन्होंने गुंबद और मेहराब को अपना आधार बनाया | जिस इस्लामी वास्तुशिल्प ने विकसित किया था | इटली के प्रसिद्ध कलाकार माइकलेंफेलों ने जब सन् 1547 में  सेंट पीटर के मकबरे की कल्पना की तो उसने यूनानी मंदिर, रोमन गुम्बद तथा इस्लामी गुम्बदों से प्रेरणा ली।

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प्रश्न 15 : नवजागरण वास्तुकला अपने दर्शको पर क्या प्रभाव छोड़ना चाहती थी? 

उत्तर : इसमें यूनानी रोमन और इस्लामी शैली का मिश्रण देखा जा सकता है | नया जागरण की वास्तुकला में प्राचीन यूनानी व रोमन संस्कृति का प्रभाव, इस्लामी वास्तुकला का प्रभाव तथा पश्चिमी प्रभाव भी देखा जा सकता है | यह वास्तुकला शैली लोगों को एक दूसरे के साथ चलने एवं नई क्लासिकल संस्कृति और सोच की भावना को आगे बढ़ाना चाहती थी।

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प्रश्न 16 : मध्यकाल में विज्ञान का अध्ययन यूरोप और भारत दोनों में लुप्त हो गया था| इसके क्या कारण रहे होंगे? 

उत्तर : मध्य काल में शिक्षा पर चर्च का प्रभाव था, जिसके कारण लोग अंधविश्वासी तथा रूढ़िवादी हो गए थे| चर्च के प्रभाव में होने के कारण बिना चर्च की अनुमति के कोई नए ज्ञान की कल्पना भी नहीं कर सकता था | अतः वहां विज्ञान का अध्ययन लुप्त हो गया, तथा भारत में मध्यकाल में सुरक्षा एवं विस्तार में लगे रहे परिणामस्वरूप विज्ञान के अध्ययन और विकास की ओर किसी का ध्यान ही नहीं रहा।

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प्रश्न 17 : यूरोप के विज्ञान के विकास में चीन , भारत और अरब देशों का क्या योगदान था? 

उत्तर : अरब सैनिकों ने चीन और भारत के वैज्ञानिक और गणितीय साहित्य का अध्ययन और अनुवाद किया था | भारतीय गणित को और खासकर स्थानीय मान आधारित संख्या पद्धति की उन्होंने अपनाया था | चीन के कुछ महत्वपूर्ण आविष्कार जैसे बारूद, छापाखाना और चुंबक को भी उन्होंने अपनाया | अरब विचारको ने चीनी और भारतीय खगोल शास्त्रियों द्वारा की गई तारों व ग्रहों आदि के चलन की गणना को आगे बढ़ाया | उनके द्वारा रचित ग्रंथ विभिन्न तरीकों से यूरोप के वैज्ञानिकों तक पहुंचे | इस तरह अरबी वैज्ञानिकों ने भारतीय और चीनी विज्ञान को यूरोप तक पहुंचाने का काम किया | जब यूरोप में प्राचीन यूनानी और लैटिन साहित्य का अध्ययन फिर से प्रारंभ हुआ तो उन्होंने यूनान के वैज्ञानिक साहित्य के अध्ययन के साथ अरब ग्रंथों का भी अध्ययन किया | उन्हीं दिनों यूरोप के नाविक भारत और चीन पूछने के नए समुद्री मार्ग की खोज रहे थे | इसके लिए समुद्र में दूर तक यात्रा करने की जरूरत थी | समुद्र में तारों व ग्रहों की स्थिति के अवलोकन से यात्रा की जा सकती थी | समुद्र में रास्ता निर्धारित करने के लिए दिक्सूंचको का भी उपयोग किया जाने लगा, उन्हीं दिनों समुद्र में दूर तक देखने के लिए दूरबीन का आविष्कार हुआ | दूरबीन कांच के लेंस से बनाई जाती थी | इसी तरह उन दिनों युद्ध में तोपों का बहुत उपयोग होता था  तोप चलाने वालों के लिए यह जानना जरूरी था कि तोप को किस कोण से दागने पर गोला कितनी दूर जाकर गिरेगा। गोले के वजन, तोप के व्यास आदि का भी अध्ययन जरूरी था। इन सबका वास्ता वैज्ञानिक अध्ययन से था। अतः व्यापारियों व राजाओं की विशेष रूचि वैज्ञानिक खोजों में बनी।

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प्रश्न 18 : विज्ञान में प्रयोग , अवलोकन और गणना के महत्व को किस प्रकार स्थापित किया गया | इनके बिना भी क्या वैज्ञानिक ज्ञान का निर्माण किया जा सकता है? 

उत्तर : मध्यकालीन यूरोप में कुछ वैज्ञानिक हुए जैसे इंग्लैंड में 12 वीं सदी में रॉजर बेकन जिसने प्रयोगों के आधार पर निष्कर्ष निकालने पर जोर दिया था | उन दिनों किसी भी प्रश्न का उत्तर आभास या अनुमान के आधार पर दिया जाता था | प्रयोग करके वास्तविकता के अवलोकन से निष्कर्ष निकालने की प्रथा नहीं थी |धीरे-धीरे बेकन के आग्रह पर कई लोग आगे बढ़े | विज्ञान में प्रयोग, अवलोकन और गणना को निम्न तरीकों से स्थापित किया गया:-

1. यूरोप के नाविकों को  भारत और चीन पहुंचने हेतु नए समुद्री मार्ग की तलाश थी | समुद्र में तारों और ग्रहों की स्थिति के अवलोकन से यात्रा की जा सकती थी | समुद्र में रास्ता निर्धारित करने के लिए चुंबकीय दिक्सूंचको का भी उपयोग किया जाने लगा, उन्हीं दिनों समुद्र में दूर तक देखने के लिए दूरबीन का आविष्कार हुआ |

2. मध्यकालीन विद्वानों का मानना था कि पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में है और सभी तारे, सूर्य, चंद्रमा और ग्रह, पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं | पोलैंड के खगोल शास्त्री कॉपरनिकस ने एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें उसने कहा कि ब्रह्मांड के केंद्र में पृथ्वी नहीं बल्कि सूर्य है, और पृथ्वी सहित सारे ग्रह उनकी परिक्रमा करते हैं |

3. चर्च ने कॉपरनिकस के विचारों का विरोध किया, क्योंकि उनके विचार उन दिनों काफी क्रांतिकारी थे | लेकिन फिर भी कई लोग इन विचारों को जांचने के लिए आसमान के तारों व ग्रहों की चाल का बारीकी से अध्ययन करने लगे | इनमें से प्रमुख था टाईको ब्रारे जिसने डेनमार्क देश में  एक वेधशाला स्थापित की थी | वहां नए वैज्ञानिक तरीकों से अवलोकन करके ग्रहों की चाल की गणना की जाती थी | इन गणनाओं का अध्ययन एक खगोलशास्त्री केपलर ने किया और पाया कि इसे समझने के लिए यह मानना ही होगा कि सूर्य के इर्द-गिर्द पृथ्वी सहित सारे ग्रह परिक्रमा करते है। जैसा कि कॉपरनिकस ने कहा था।

4.केपलर ने यह स्थापित किया कि भौतिकी जगत के बारे में हम केवल विश्वास और धर्म ग्रंथों व मान्यताओं के आधार पर नहीं बल्कि बारीक अवलोकन व गणना से समझ सकते हैं. इसी बात को इटली के वैज्ञानिक गैलीलियो ने आगे बढ़ाया | गैलीलियो की विशेषता यह थी कि उसमें कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे और उनके उत्तर जानने के लिए प्रयोग किए और उनके आधार पर निष्कर्ष निकाले | उसने बारीक मापन और गणना को अत्यधिक महत्व दिया. यही सब आधुनिक विज्ञान के मूल सिद्धांत बने |

5. गैलीलियो ने नाविकों को एक नए आविष्कार टेलीस्कोप का उपयोग ग्रहों को देखने के लिए किया | अपने अध्ययन के आधार पर गैलीलियो ने कॉपरनिकस के सूर्य केंद्रीय सिद्धांत को सही पाया और उसने इस बात को पुस्तक में प्रकाशित किया | गैलीलियो ने इस वर्ष विरुद्ध उसके ऊपर धर्म के ठेकेदारों ने मुकदमा चलाया |

6. केपलर और गैलीलियो की खोजों के आधार पर अंग्रेजी वैज्ञानिक आइजैक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण और खगोलीय पिंडों की गति का सिद्धांत प्रतिपादित किया | न्यूटन के काम से एक नया युग का प्रारंभ हुआ , जिसमें विज्ञान को शीर्ष स्थान मिला |

इस प्रकार पूर्व आधुनिक काल में धार्मिक पूर्वाग्रह से मुक्त होकर नए विज्ञान की शुरुआत हुई| इस नए विज्ञान ने पूर्व मान्यताओं पर आधारित न होकर प्रयोग और गणना के प्रमाणों को अपना आधार बनाया | अंततः हम कह सकते हैं कि विज्ञान में प्रयोग,अवलोकन और गणना के बिना वैज्ञानिक ज्ञान का निर्माण नहीं किया जा सकता।

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प्रश्न 19 : यूरोप के नाविक किस उद्देश्य से समुद्री यात्रा  थे और उनके काम  विज्ञान का क्या महत्व था? 

उत्तर : 

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