CG Board Class 9 SST Solutions Chapter 7 धर्म सुधार और प्रबोधन सन् 1300 – 1800 are given below for Hindi Medium Students.
CG Board Class 9 SST Solutions Chapter 7 धर्म सुधार और प्रबोधन सन् 1300 – 1800
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प्रश्न 01 : हम आम लोगों के धार्मिक विश्वासों में अक्सर कई धर्मों के प्रभावों को देख सकते है | क्या आप इसके कुछ उदाहरण दे सकते है?
उत्तर : हां हम आम लोगों के धार्मिक विश्वासों में कई धर्मों के प्रभावों को देख सकते हैं। इसके कुछ उदाहरण निम्न है –
1 भारत में हिन्दू धर्म की जटिलता और वैदिक कर्मकाण्डों के विरूद्ध भारत में बौद्ध एवं जैन धर्मों का उदय हुआ लेकिन इन दोनों ने ही काफी समय बाद हिन्दू धर्म की कई मान्यताओं को अपना लिया जैसे बुद्ध की मूर्ति पूजा करना तथा कई हिन्दू रीति-रिवाजों को भी अपनाया।
2 भारत में इस्लाम के प्रचार के साथ उसके कई तत्वों को अन्य लोगों ने स्वीकार कर लिया। दरगाह पर जाना, मजारों में प्रार्थना करना, सूफी विचारों को मानना इसके प्रमुख उदाहरण है।
3 जैन तथा बौद्ध धर्मों के उदय से भारत के वैदिक कालीन कर्मकाण्डों में शिथिलता आई।
4 आम लोगों के धार्मिक विश्वासों में भी काफी विविधता थी, इनमें समय के साथ लगातार बदलाव आ रहे थे। हर समुदाय के अपने-अपने देवी-देवता और उपासना के तरीके थे। जब ये समुदाय एक दूसरे के करीब आए और साथ – साथ रहने लगे तो वे एक-दूसरे के देवी-देवताओं को भी अपनाने लगे।
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प्रश्न 02 : इस्लाम में किन सवालों को लेकर धार्मिक मतभेद उभरे थे?
उत्तर : भारत को छोड़कर अधिकांश देशों में इस्लाम ही लोगों का प्रमुख धर्म था और इस ईसाई या यहूदी अल्पसंख्यक समुदाय थे | लेकिन हम पाते हैं कि इस्लाम में भी बहुत विविधता थी | हालांकि इन सभी इस्लामी संप्रदायों ने कुरान शरीफ को ईश्वर का पैगाम माना और मोहम्मद नबी को उनका पैगाम पहुंचाने वाला पैगंबर माना, फिर भी इस्लाम का मतलब क्या है ? कुरान का असली मतलब और निहितार्थ क्या है ? हमें क्या करना है, कैसे जीवन बिताना है, ईश्वर का स्वरूप क्या है? इस तरह के सवालों को लेकर बहुत मतभेद थे | एक बुनियादी मतभेद तो शिया और सुन्नी मुसलमानों से बना | पैगंबर के बाद क्या दैवीय सत्ता उनके परिवार के उत्तराधिकारियों में भी है | शिया मानते थे कि पैगंबर के वंशजों को मुसलमानों के इमाम या रहनुमा माना जाना चाहिए | लेकिन यह सुन्नियों को स्वीकार नहीं था, और वे किसी परिवार या व्यक्ति को विशेष दर्जा देने के पक्ष में नहीं थे, बाद में शिया और सुन्नी दोनों के अंदर कई मतभेद होते चले गए।
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प्रश्न 03 : दार्शनिकों और सूफियों के विचारों में क्या अंतर थे?
उत्तर : इस्लाम की व्याख्या के विकास में यूनानी, दार्शनिक और वैज्ञानिक साहित्य और अध्यात्मवादी, सूफी संतों का यह प्रभाव महत्वपूर्ण रहा | जिन विद्वानों ने यूनानी ग्रंथों का अध्ययन किया वह तार्किक सोच, वैज्ञानिक अन्वेषण आदि पर जोर देते थे, और संकीर्ण धार्मिक सोच से हटना चाहते थे | अर्थात् दार्शनिकों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि मनुष्य को अपने आसपास की दुनिया का अध्ययन करना चाहिए और धर्म विरोधी नहीं बनना चाहिए | उन सभी विद्वानों का यह मानना था कि दर्शन और विज्ञान की मदद से हम ईश्वर को भी समझ सकते हैं | यह विचार सूफिया के विचारों के विपरीत तथा सूफी संतों के विचार दार्शनिकों से भिन्न थे| सूफी संत यह मानते थे कि मनुष्य के जीवन का ध्येय ईश्वर को प्राप्त करके, उसमें समा जाना है | यह ईश्वर से गहरे प्रेम के द्वारा ही हो सकता है| उन्होंने माना कि तार्किक सोच, दर्शन या फिर बाहरी कर्मकांड आदि इसमें बाधक होंगे। उनका मानना था कि मनुष्य विशेष साधनाओं जैसे ध्यान, जाप आदि से चरण दर चरण ईश्वर तक पहुंच सकता है | कुछ सूफी तो यहां तक मानते थे कि मनुष्य और ईश्वर में कोई अंतर या दूरी नहीं हो सकती है | कई सूफियों ने बौद्ध और योग के ग्रंथों को फारसी में अनुवाद किया और उनका गहन अध्ययन किया | इस तरह के दार्शनिकों और सूफियों के विचारों से परंपरावादी मुसलमान असहमत थे| उन्होंने उन का पुरजोर विरोध किया और उन्हें यातनाएं भी दी लेकिन इन विचारों को मिटाया नहीं जा सका और वे विकसित होते गए।
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प्रश्न 04 : मध्यकालीन भारत अरब एवं यूरोप में धर्म की स्थिति में आपको क्या समानताएं और अंतर नजर आ रहे है?
उत्तर : मध्यकालीन भारत के धर्म में बहुत विविधता थी | इन विविध संप्रदाय व ग्रंथों को मानने वालों में आपस में बहस और विवाद भी होते रहते थे, विभिन्न क्षेत्रों में धार्मिक विविधता थी, व विश्वास अलग-अलग थे | वैदिक धर्म के अनुयाई कर्मकांडों को मानने वाले थे | मूर्तियों की पूजा का भी प्रचलन था | वैदिक धर्म के अलावा जैन, बौद्ध आदि धर्म भी थे, मध्य काल के समय मुस्लिम धर्म का भी बोलबाला था | परंतु भारत में सभी धर्मों के लोग एक साथ मिलजुल कर रहते थे| सभी भारतीय शासक भी धर्मनिरपेक्ष हुआ करते थे | कुल मिलाकर भारत में धर्मों के मध्य बहुत विविधता देखने को मिलती रहती थी | इस्लाम में भी बहुत से विविधताएं देखने को मिलती थी, इस्लाम भी दो भागों में बंट चुका था शिया और सुन्नी जिनके मध्य मतभेद और टकराव अधिक थे वे एक दूसरे के ही कट्टर विरोधी बनते जा रहे थे | आगे चलकर इस्लाम में भी बहुत से दार्शनिक ऐसे हुए जो धार्मिक कट्टरता की जगह ज्ञान, विज्ञान और शिक्षा पर अधिक जोर देने लगे थे |
यूरोप में प्रचलित धर्म में चर्चों का भी बहुत प्रभाव था और वह कैथोलिक चर्च के नियंत्रण में ही था, तथा इसमें भी कई तरह के कर्मकांड थे, जिसके कारण रोमन कैथोलिक धर्म के विरुद्ध धर्म सुधार आंदोलन हुआ और प्रोटेस्टेंट संप्रदाय की स्थापना हुई | इस प्रकार हम देखते हैं कि इन तीनों में कई समानताएं थीं| जैसे कि भारत में धर्म में कर्मकांड, कुरीतियां, जातिवाद आदि विद्यमान थी | मुस्लिम समाज में भी थे, और यूरोप में भी धार्मिक कर्मकांड थे, तीनों स्थितियों में कुछ असमानताएं भी थी | जैसे भारतीय धर्म में कट्टरता नहीं थी, आपसी सद्भाव था, मुस्लिम धर्म में कट्टरता मतभेद था, यूरोपीय धर्म में भी अंदर ही अंदर काफी मतभेद थे।
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प्रश्न 05 : कैथोलिक चर्च की किन बातो से प्रोटेस्टेंट असहमत थे?
उत्तर : कैथोलिक चर्च का कथन था कि पाप से मुक्ति पाने के लिए लोगों को क्षमा पत्र और दंडमोचन की प्रक्रिया से गुजरना होगा। जर्मनी की कई छोटी छोटी रियासतों ने अपने कैथोलिक सम्राट पर दबाव डाला और सन् 1555 में प्रजा को अपना धर्म प्रोटेस्टेंट या कैथोलिक चुनने का अधिकार दिया गया, प्रोटेस्टेंट सम्प्रदाय दरअसल एक सम्प्रदाय नहीं था, उसमें लूथर कैल्विन ज्विंगली आदि के विचारों से प्रेरित अनेक धाराएं थी।
1 किसी भी व्यक्ति का धार्मिक मार्ग व धार्मिक विश्वास चर्च नहीं तय कर सकता है।
2 वे धार्मिक कर्मकाण्डों के पुरजोर विरोधी थे।
3 चर्च द्वारा पाप से मुक्त होने के लिए दंडमोचन पत्र या क्षमा पत्र से वे पूरी तरह सहमत थे।
4 प्रोटेस्टेंट मानते थे कि हर ईसाई खुद एक पादरी बनकर ईश्वर से संपर्क कर सकता है।
5 कैथोलिक चर्च द्वारा समाज में फैलायें जाने वाले कुरीतियों के वे विरुद्ध थे।
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प्रश्न 06 : आपको भारत के भक्ति आंदोलन, सूफी आंदोलन और प्रोटेस्टेंट आन्दोलन के बीच क्या समानता व अंतर दिखते हैं?
उत्तर :भारत के भक्ति आंदोलन, सूफी आंदोलन, और प्रोटेस्टेंट आंदोलन के बीच समानताएं व अंतर निम्न है-
समानताएं – 1 तीनो ही आंदोलनों ने कुरीतियां बाह्य आडम्बरों और धार्मिक कर्म काण्डों का पुरजोर विरोध किया।
2 तीनों ही आंदोलनों ने जात-पात जैसे बाह्य आडम्बरों का खुलकर विरोध किया और सभी को समानता के अधिकार को प्राप्त करवाया।
3 प्रोटेस्टेण्ड धर्म के अनुसार ईसाई खुद एक पादरी बनकर ईश्वर से संपर्क कर सकता है। सूफी एवं भक्ति आंदोलन की यह मान्यता थी कि व्यक्तिगत साधना के माध्यम से कोई भी ईश्वर से संपर्क स्थापित कर सकता है।
असमानताएं – 1 सूफी व भक्ति सन्तों ने सामाजिक भेदभाव एवं जाति प्रथा आदि का भी विरोध किया लेकिन प्रोटेस्टेन्ट सम्प्रदाय ने केवल धर्म से जुड़ी हुई बुराइयों को विरोध किया।
2 सूफी व भक्ति आंदोलन का संबंध मध्यकालीन भारतीय समाज से था जबकि प्रोटेस्टेण्ड का संबंध मध्यकालीन यूरोपीय धर्म से था।
3 प्रोटेस्टेंट आंदोलन ने धार्मिक सत्ता को स्वीकारा जबकि भक्ति आंदोलन ने ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रार्थना से बताया और सूफी आंदोलन में ईश्वर प्राप्ति का मार्ग सतत स्मरण को बताया गया।
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प्रश्न 07 : क्या आपको यह लगता है की धार्मिक ग्रन्थ आम लोगों की समझ में आने वाली भाषा में ही होने चाहिए? अपना तर्क दे |
उत्तर : हां हम इस बात से पूरी तरह सहमत है कि धार्मिक ग्रन्थ आम लोगों की समझ में आने वाली भाषा में ही होने चाहिए क्योंकि यह हम सबका मौलिक अधिकार है कि हम अपनी इच्छा के अनुसार अपने धर्म को चुने और जब तक इच्छा हो उसी धर्म के अनुसार अपने जीवन का निर्वाह करें। यदि ये ग्रंथ आम भाषा में होते तो हम सब को सही और गलत की पहचान हो सकती थी। धार्मिक भाषा एक ऐसी भाषा होती है जिसे धार्मिक प्रयोगों के लिये इस्तेमाल किया जाता है। धर्म सुधार आंदोलनों में भाषा की समझ को व्यापक बनाया जिसे रूढ़िवादिता, अंधविश्वासों और कर्मकाण्डों से समाज को बहुत हद तक छुटकारा भी मिला।
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प्रश्न 08 : क्या आपको लगता है कि हर व्यक्ति को खुद अपने लिए अपने धर्म की व्याख्या करनी चाहिए?
उत्तर : हां हमें लगता है कि प्रति व्यक्ति को स्वतः ही अपने धर्म की व्याख्या करनी चाहिए क्योंकि मानव जीवन का उद्देश्य ही है कि वह अपने मन वचन और भावों व शरीर किसी और के काम आएं अन्यथा उसका जीवन भार तुल्य ही होगा। लगभग सभी धार्मिक ग्रंथों में मनुष्यों को जीवन जीने को कल से अवगत कराया गया है। हम से देखते है कि जो लोग दूसरों की मदद करते है उन्हें कम तनाव रहता है, तथा उन्हें ही मानसिक शांति और आनंद का अनुभव होता है।
मार्टिन लूथर का कथन है कि लोगों को धर्म को समझने के लिए किसी वर्ग विशेष पर निर्भर नहीं करना चाहिए। क्योंकि इससे धर्म की संकुचित व्याख्या करके भी प्रस्तुत किया सकता है। इसलिए लोगों को चाहिए कि वे ग्रंथों का अध्ययन और मनन स्वयं करें।
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प्रश्न 09 : क्या आपको लगता है की आज का मनुष्य सौ साल के पहले के मनुष्य से अधिक विकसित है | किन मायनों में आज मनुष्य का जीवन सौ साल के जीवन से बेहतर है और किन मायनों में बदतर है?
उत्तर : हां आज का मनुष्य सौ साल के पहले के मनुष्य से अधिक विकसित है। क्योंकि वर्तमान,भूतकाल से कहीं अधिक बेहतर है और मनुष्य विज्ञान, सूझबूझ और उद्यमिता के सहारे आने वाले दिनों में तरक्की पाता जा रहा है। मनुष्य विज्ञान और तकनीक की मदद से पहले से कहीं अधिक प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है। विकास का वास्तविक मापदंड है मनुष्य की स्वतंत्रता में वृद्धि की ओर जीवन में विकल्पों की प्रचुरता। आधुनिक काल उन्नत इसलिए है क्योंकि मनुष्य पहले से अधिक स्वतंत्र है और वह विभिन्न जीवन-शैलियों के बीच चुनाव कर सकता है। किन्तु मानवीय मूल्यों में घटते स्तर से आज के मनुष्य का जीवन बदतर होता जा रहा है।
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प्रश्न 10 : प्रगति से आप क्या समझते है – समृद्धि , सुख , ख़ुशी , स्वतंत्रता | इनमे से कौन से शब्द को आप प्रगति के सबसे अधिक निकट पाते है?
उत्तर : प्रगति का तात्पर्य खुशी, समृद्धि या सुख नहीं है बल्कि प्रगति का वास्तविक अर्थ मनुष्य की स्वतंत्रता में वृद्धि और जीवन में विकल्पों की प्रचुरता से है। आधुनिक काल को प्रगति का काल माना गया है। क्योंकि मनुष्य पहले से अधिक स्वतंत्र है, और वह विभिन्न तरह की जीवन शैलियों के मध्य चयन कर सकता है। अतः हम सकते हैं कि समृद्धि,सुख,खुशी और स्वतंत्रता शब्द को हम प्रगति के सबसे निकट पाते है।
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प्रश्न 11 : किसी के द्वारा प्रदत्त ज्ञान की जगह अपनी ही बुद्धि व तर्कशक्ति पर निर्भर होने के लिए हिम्मत की क्यों जरूरत है?
उत्तर : बुद्धि ही मनुष्य को कही रास्ता दिखा सकती है। इसलिए प्रबोधन का मुख्य मकसद लोगों में तर्क शक्ति जागृत करना तथा उसमें विश्वास जगाना है। अगर हम अपनी बुद्धि और तर्क शक्ति पर निर्भर रहते है तो इसके लिए हमें परंपरावादी विचारों से संघर्ष करना होता है। और यह संघर्ष तर्क बुद्धि के साथ हिम्मत द्वारा ही कर सकते हैं, क्योंकि परंपरावादी विचार पहले से स्थापित रहते है। इस कारण उनके साथ समाज व धर्म रहता है। लेकिन जो इन परंपराओं को विरोध तर्क और बुद्धि के आधार पर करते हैं प्रारंभ में उनके साथ कोई नहीं होता अतः हिम्मत के साथ आगे बढ़ना आवश्यक है यदि आप सही है तो धीरे-धीरे बुद्धिवादी लोग आपके साथ आते ही रहेंगे।
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प्रश्न 12 : प्रबोधन के विज्ञान और उसके पहले के विज्ञान में क्या मुख्य अंतर था?
उत्तर : प्रबोधन ने माना कि वैज्ञानिक ज्ञान ही सही ज्ञान है। विज्ञान से उनका तात्पर्य था ऐसे निष्कर्ष जिन पर अवलोकनों व प्रयोग के आधार पर तार्किक रूप से पहुंच गया है। और जिसका स्पष्ट प्रमाण हो। किसी दैवीय संदेश या आध्यात्मिक ज्ञान की प्रमाणिकता को स्वीकार नहीं करना चाहिए। उनके विचार में विज्ञान के तरीकों में वह ताकत है जिसकी मदद से हम दुनिया के बारे में सब कुछ पूरी तरह जान सकते है। प्राचीन काल तथा मध्यकाल में ज्ञान के संबंध में यह माना जाता था कि वह केवल चीजों का व्यवस्थित वर्गीकरण है। प्रबोधन के वैज्ञानिकों के अनुसार ज्ञान का उद्देश्य सूची बनाना नहीं बल्कि चीजों के कारणों को समझा है। अब क्यों व कैसे जैसे सवाल कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए। वे मानते थें कि इस ज्ञान की मदद से हम कई तकनीकों को विकसित कर सकते है। जिनसे जीवन अधिक सुखमय हो सकता है।
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प्रश्न 13 : क्या किसी धर्म को न मानकर केवल ईश्वर को मानना संभव है?
उत्तर : धर्म मनुष्य को अंध विश्वासी व डरपोक तथा गुलाम बना देता है। धर्म के नाम पर ही मार-काट अथवा दंगे होते रहें है। ईश्वर में आस्था का अर्थ यह नहीं है कि हम किसी धर्म को माने या किसी भी व्यक्ति विशेष के अंधविश्वास को महत्व दें। धर्म में ठेकेदारों की दुकानें हमारे मूर्खता के कारण ही चल रही है। हमें सिर्फ और सिर्फ मानव धर्म का पालन करना चाहिए। इस बात का जाग्रत प्रमाण है कि सृष्टि कार्य ईश्वर कितना महान है उसने हमें कोई विशेष धर्म के मुहर का उपयोग करने नहीं बनाया है। अपितु हमें वह बस अपनी संतान मानता है। अतः ईश्वर और धर्म को किसी व्यवस्था संगठन या पुजारियों के हाथ नहीं सौंपना चाहिए। समस्त सृष्टि में ईश्वर सिर्फ एक है और हम सब उसकी संतान है,यही सत्य है, और कुछ भी नहीं।
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प्रश्न 14 : किन परिस्थितियों में धर्म मनुष्यो को जोड़ता है और किन परिस्थितियों में धर्म के कारण लोग लड़ते है?
उत्तर : जब धर्म में कर्मकाण्ड अंधविश्वास और एकाधिकारी जैसी प्रवृत्तियां बढ़ जाती है तो लोग धर्म के कारण आपस में लड़ने लगती है। लेकिन यदि धर्म सच्चा है सद्भावना एवं परमार्थ के भाव से हम धर्म का पालन करें तो धर्म हमें एक-दूसरे से जोड़ता है।
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प्रश्न 15 : व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विज्ञान के विकास में कोई सम्बन्ध देख सकते है? बताएं |
उत्तर : प्रबंधन के समर्थक व्यक्तिगत स्वतंत्रता में गहरी आस्था रखते थे,उनका मानना था कि लोगों पर अगर कोई कानून लागू करना है तो वह उसकी सहमति से ही हो सकता है। इस कारण वे हर तरह की गुलामी गैर लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं और निरंकुशता के खिलाफ थे लेकिन इसके बावजूद प्रबोधन के कई चिंतन तत्कालीन निरंकुश शासकों के निकट मित्र और सलाहकार थे। उनके प्रभाव से ही 21 शासकों ने अपने राज्यों में सुधार लाने का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप इस काल में विज्ञान का अत्यधिक विकास संभव हो पाया।
अभ्यास –
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प्रश्न 01 : मध्यकालीन भारत में परम सत्य के बारे में क्या – क्या कल्पनाएँ थी?
उत्तर : मध्यकालीन भारत में परम सत्य के बारे में निम्नलिखित कल्पनाएं और मतभेद थे। ईश्वर ही सत्य है, बाकी सब मिथ्या या झूठ है। आठवीं सदी के महान विचारक शंकराचार्य ने बताया कि अंतिम सत्य एक ही है जिसे हम ब्रहम कहते हैं। अर्थात उनके अनुसार बाकी सभी वस्तुएं मिथ्या है और सत्य तक पहुंचने के लिए संसार का त्याग कर ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने अपने विचार के समर्थन में अनेक ग्रंथों की रचना की परन्तु बहुत से वेदांती उनसे सहमत नहीं थे। उनमें से एक थे बारहवीं सदी के रामानुजाचार्य जिनका मानना था कि अंतिम सत्य ही ईश्वर है। जो सृष्टि का सृजन पालन व विनाश करता है। इसके अलावा जीव भी है जो ईश्वर में लीन होने के लिए आतुर हैं और यह व्यक्ति के माध्यम से हो सकता है। इसके बाद सदियों तक इन दोनों विचारों के अनुयायियों के बीच वाद-विवाद चलता रहा और इस बीच नए-नए विचार उत्पन्न होते रहें।
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प्रश्न 02 : भारत में धार्मिक विविधता का लोगो के जीवन पर क्या प्रभाव रहा होगा?
उत्तर : मध्यकालीन भारत के धर्म में बहुत विविधता थी। इन विविध सम्प्रदाय व पन्थों को मानने वालों में आपस में बहस और विवाद भी होते रहते थे। लोग एक-दूसरे की बातों को मानते भी थे पर कभी-कभी लड़ाई झगड़े भी होते थे। इसके बावजूद विविधता बनी रहीं। इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यह था कि इन धर्मों में कोई एक अधिकारिक केन्द्र नहीं बना। किसी एक केन्द्र या संस्था या व्यक्ति को यह अधिकार नहीं था कि वह सबकों बताए कि सही क्या है और गलत क्या है। हर व्यक्ति या पन्थ अपने स्वर पर सही-गलत तय करने के लिए स्वतंत्र था। हर व्यक्ति अपनी जरूरत अनुभव , रूचि के अनुरूप अपना पन्थ चुन सकते थे। लेकिन धार्मिक लचीले पन के साथ सामाजिक रूढ़िवादिता जुड़ी हुई थी।
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प्रश्न 03 : जाती व्यवस्था ने किस प्रकार लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित किया होगा?
उत्तर : मध्यकालीन भारतीय समाज के जातिगत भेदभाव के साथ-साथ धन और सत्ता के आधार पर अत्यधिक सामाजिक असमानताएं थी । मध्यकाल में जाति व्यवस्था लगभग पूरे भारत के प्रभावशाली हो गई थी। जिसके कारण धर्मग्रंथों का अध्ययन मंदिरों में पूजा और प्रवेश जाति और जन्म से निर्धारित होने लगा । सम्पूर्ण समाज जाति के आधार पर चार वर्गों में बांटा जा चुका था। ब्राह्मण,वैश्य,क्षत्रिय व शूद्र । आमतौर पर दलित जातियों तथा महिलाओं पर सीमाओं को लांघने पर उन्हें दंडित किया जाता था। इस प्रकार के पाबन्दियों से लोगों के जीवन में धर्म की स्वतंत्रता सम्पूर्ण रूप से सीमित और प्रतिबंधित हो चुकी थी। जाति व्यवस्थाओं की कठोर नीतियों के कारण ही मनुष्यों के जीवन अत्यधिक प्रभावित हो रहे थे।जिसके कारण आम लोगों ने इसका पुरजोर विरोध करना शुरू कर दिया था।
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प्रश्न 04 : अकबर की धर्म सहिष्णु नीति के बनने के पीछे क्या – क्या कारण रहे होंगे?
उत्तर : मुगलबादशाह अकबर ने धर्मसहिष्णु की नीति अपनाई थी इसके निम्न कारण रहे होंगे-
1 अकबर का मानना था कि बादशाह ईश्वर का प्रतिनिधि है और जिस तरह ईश्वर अपनी कृपा अर्थात् धूप व वर्षा हर धर्म के मनुष्यों पर समान रूप से बरसाता है उसी तरह बादशाह को भी किसी से धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए।
2 बादशाह की जिम्मेदारी होने चाहिए कि राज्य में कितने लोग हैं[ वे शांति से रहें और समृद्धि पाएं। अर्थात बादशाह किसी एक धर्म का नहीं अपितु सभी धर्म के लोगों के लिए है।
3 अकबर एक तरह का बुद्धिवादी बादशाह था। जो परम्परागत अंधविश्वासी धर्म को स्वीकार नहीं करना चाहता था। उसका मानना था कि हमें हर धर्म की अच्छाई को अपनी बुद्धि द्वारा पहचान कर स्वीकार करना चाहिए और जो गलत लगता हो उसे अतिशीघ्र छोड़ देना चाहिए।
4 अकबर ने रूढ़िवादिता को नकारा और सभी धर्मों को समानता का अधिकार देने का प्रयास किया क्योकिं वह जानता था कि यदि सभी धर्मों को समानता का अधिकार न मिला तो एक स्थायी राज्य की कल्पना सिर्फ सपना बनकर रह जायेगी। अतः हम कह सकते हैं कि यहि कारण रहे होगें एक बादशाह धर्म सहिष्णु की नीति पर चला होगा।
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प्रश्न 05 : कबीर जैसे विचारकों ने किस प्रकार धर्मों के घेरे से निकलकर ईश्वर भक्ति की बात की?
उत्तर : मध्यकाल भारत में सामाजिक असमानता भेदभाव धार्मिक विविधता और वैचारिक टकरावों के बीच कबीर जैसे अनमोल विचारक का उदय हुआ । कबीरदास ने उस समय में फैली रूढ़िवादिता असमानता और कई ऐसी कुरितियां थी जिनको एक सिरे से नकारा वे अपने विचारों के माध्यम से लोगों को यह बताना चाहते थे कि ईश्वर एक है और उन तक पहुंचने के लिए किसी कर्मकाण्ड या मंदिर,मस्जिद, गुरूद्वारे तथा गिरिजाघर की आवश्यकता नहीं अपितु ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम व विश्वास की आवश्यकता है। मनुष्यों को सभी जीवों की पीड़ा समझना और उसे इस पीड़ा को दूर करने का प्रयास ही ईश्वरीय मार्ग है। अतः वह मनुष्य, मनुष्य नहीं है जो जीवों पर दया भाव नहीं रखता अर्थात् वह भी पशुओं के समान है। जिसे दूसरों की पीड़ा का एहसास न हो। उन्होनें जात-पात के भेदभाव तथा धार्मिक कर्मकाण्डों को समाप्त करने के अचूक प्रयास किये।
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प्रश्न 06 : महिला भक्तों की जीवनी में आपको क्या समानताएं व भिन्नताएं दिखाती है?
उत्तर : मध्यकाल में सभी धार्मिक संस्थाओं पर पुरूषों का ही एकाधिकार था और महिलाओं को धार्मिक ग्रन्थों के अध्ययन के दूर रखा जाता था। तब ऐसी अनेक महिलाएं थी जिन्होंने गृहस्थ को छोड़कर धर्म को अपनाया। अर्थात् कई महिलाएं ऐसी भी थी जो घर – गृहस्थी को छोड़कर स्वतंत्र रूप से धार्मिक जीवन व्यतीत करने लगी। जिनमें कर्नाटक की अम्बादेवी, राजस्थान की मीराबाई, कश्मीर की लल्ल दंद जैसे कई महिला भक्त प्रचलित हुई-
| समानताएं | असमानताएं |
| 1.इन सभी महिलाओं ने परिवार के मोह-माया से निकल कर ईश्वर की भक्ति को अपनाया।2. ये सभी महिलाएं हमेशा ईश्वर की भक्ति में ही लीन रहती थी और समाज तथा परिवार को सम्पूर्ण रूप से त्याग दिया था।3. ये समाज में फैली रूढ़ियों के खिलाफ अपनों से भी लड़ी और अपना वर्चस्व स्थापित किया। | 1.कुछ महिला भक्तों में से अम्बा देवी ने अपने पति व परिवार का त्याग करे ईश्वर की भक्ति को महत्व दिया।2. लल्ल देद जैसी ईश्वर भक्त ने सूफी सन्तों के साथ मिलकर एकेश्वरवाद का प्रचार किया जबकि कुछ महिला भक्तों ने स्वतंत्र होकर एक-एक मूर्ति को अपनी श्रद्धा के लिए अपनाया।3. मीरा बाई एक विधवा महिला थी फिर भी उन्होंने लोकलाज त्याग कर कृष्ण की भक्ति की ओर सामन्तवादी अत्याचारों का पुरजोर विरोध किए। |
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प्रश्न 07 : परम्परावादी मुसलमान , दार्शनिक मुसलमान और सूफियों में क्या – क्या भिन्नताएँ थी?
उत्तर : परम्परावादी मुसलमान कुरान शरीफ को ईश्वर का पैगाम मानते थे। तथा सामूहिक प्रार्थना पर जोर देते थे। जबकि दार्शनिक मुसलमान तार्किक सोच को अल्लाह को समझने का साधन मानते थे। परन्तु सभी सन्तों ने ध्यान व जप को ही ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम माना और इसी पर जोर देते थे। अतः परंपरावादी मुसलमान इस प्रकार के दार्शनिकों गण सूफियों के विचारों से पूरी तरह असहमत है और उन्होंने उनका पुरजोर विरोध भी किया और उन्हें यातनाएं भी दी लेकिन दार्शनिकों एवं सुफियान के विचारों को मिटाया नहीं जा सका और वे विकसित होते रहे।
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प्रश्न 08 : मध्यकालीन इस्लामी दार्शनिकों ने किस प्रकार प्राचीन यूनानी दर्शन को आधुनिक विश्व तक पहुँचाया?
उत्तर : मध्यकालीन इस्लामी दार्शनिकों न यूनानी ग्रन्थों का संपूर्ण अध्ययन किया जिससे वे तार्किक सोच, अन्वेषण आदि पर जोर दे सके और संकीर्ण धार्मिक सोच को बदल सके। उनके अथक् प्रयासों से मानव शरीर शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, गणित, खगोल शास्त्र तथा रासायनों के अध्ययन को बहुत बढ़ावा मिला। उन्होनें यूनानी ग्रन्थों के अलावा चीन और भारत के वैज्ञानिक और गणितीय साहित्य का भी अध्ययन किया और अनुवाद किया । इनमें से प्रमुख थे अल्बरूनी जिन्होनें लगभग एक हजार साल पहले भारत में कई वर्ष बिताकर यहां के ग्रन्थों को पढ़ा और अरबी में अनुवाद किया। इलासिना उस काल के प्रमुख वैद्य और दार्शनिक थे चिकित्सा और दर्शन के बारे में उनकी पुस्तकों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ और आधुनिक काल की शुरूआत तक चिकित्सकों को बढ़ाया जाता रहा। यूरोपीय चिन्तन पर प्रभाव छोड़ने वाले इस्लामी दार्शनिकों में इरान के गणितज्ञ अल ख्वारिजमी तथा स्पेन के अलरूरद के नाम अग्रणी हैं।
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प्रश्न 09 : मध्यकालीन यूरोप में चर्च की भूमिका क्या थी? इस भूमिका पर धर्म सुधार का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर : मध्यकालीन यूरोप में ईसाई धर्म सम्पूर्ण रूप से चर्च पर केंद्रित था अर्थात चर्च का प्रभाव सम्पूर्ण यूरोप पर था।एक प्रकार से राज्य और धर्म के अधिकारी संयुक्त रूप से शासन चलाते थे। प्रत्येक ईसाई व्यक्ति को चर्च का सदस्य होना अनिवार्य था। धार्मिक सहिष्णुता तथा व्यक्ति द्वारा धार्मिक रास्ता चुनने की कोई स्वतंत्रता नहीं थी। यह माना जाता था कि अच्छे ईसाई की जीवन जीने और मुक्ति पाने के लिए पार्टियों और उनके द्वारा संचालित कर्मकाण्डों की परम आवश्यकता है।अर्थात सभी धार्मिक मामले में चर्च की बातों को ही स्वीकार किया जाता था। पोप की धार्मिक सत्ता सर्वोपरि थी। श्रद्धालुओं को क्षमा पत्र खरीदने के लिए बाध्य किया जाता था।
धर्म सुधार आंदोलन में मार्टिन लूथर किंग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मार्टिन लूथर ने चर्च के इन दोषों का विरोध किया उनके द्वारा शुरू किये गये प्रयास की धर्म सुधार के नाम से जाने जाते हैं। धर्म सुधार के परिणाम स्वरूप यूरोप में ईसाई दो भागों में बांटे गये। मार्टिन लूथर के अनुयायी प्रोटेस्टेंट कहलाए। और पुराने धर्म को मानने वाले प्रोटेस्टेंट कहलाए, प्रोटेस्टेंट धर्म के भी आंतरिक सुधार हेतु प्रति धर्म सुधार आंदोलन हुआ।
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प्रश्न 10 : मार्टिन लूथर ने किन बातों को लेकर कैथोलिक चर्च की आलोचना की?
उत्तर : मार्टिन लूथर ने निम्न बातों को लेकर चर्चा की आलोचना की –
1. प्रत्येक ईसाई स्वयं एक पादरी के रूप में ईश्वर से संपर्क कर सकता है। उसे किसी भी धर्म के ठेकेदार की आवश्यकता नहीं है।
2. धर्म की सम्पूर्ण जानकारी के लिए भक्तों को स्वयं ही धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए जिससे वे उसकी महत्ता को स्वयं ही समझ सके वह भी सही ढंग से।
3. श्रद्धालुओं को माफीनामा देना शुरू किया गया था जिसका मार्टिन ने पुरजोर विरोध किया था।
4. ईश्वरीय कृपा और अंतःकरण की आस्था मोक्ष के लिए आवश्यक है। चर्च द्वारा एवं पोप द्वारा जारी किये गये माफी नामा का कोई औचित्य नहीं।
5.लूथर ने तीन पुस्तकें प्रकाशित करके अपने विचारों को जनता तक पहुंचाया उसके इन्हीं विचारों ने प्रोटेस्टेंट सम्प्रदाय का रूप लिया।
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प्रश्न 11 : धर्म सुधार आंदोलन और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच आप क्या संबंध देख पते है?
उत्तर : मार्टिन लूथर के प्रयासों से ही धर्म सुधार आंदोलनों की शुरूआत हुई। इससे पहले यूरोप के लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता नहीं दी गई थी। अर्थात सब कुछ चर्च की इच्छा अनुसार ही होता था। धर्म सुधार आंदोलन के कारण कैथोलिक धर्म की बुराइयों के साथ धार्मिक कुरीतियों का समापन हुआ। धीरे-धीरे धर्म के ऊपर से राज्य की सत्ता समाप्त करना, धार्मिक स्वतंत्रता स्थापित की गई। इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म सुधार आंदोलन के कारण धार्मिक स्वतंत्रता स्थापित हो सकी।
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प्रश्न 12 : प्रबोधन की मुख्य विशेषताएं क्या थी? उसका वैज्ञानिक क्रांति से क्या संबंध था?
उत्तर : अठारहवीं सदी को आधुनिक युग के रूप में जाना जाता है। इस युग में यह लगने लगा था कि तर्क , विज्ञान और उद्यम की मदद से जीवन में सुधार आ सकता है,और मनुष्य अज्ञान से ज्ञान की ओर जा सकता है। लेकिन ऐसी प्रगति तब ही संभव होगी जब तर्क और विज्ञान किसी के वर्चस्व या सत्ता के आगे झुके या रुके नहीं। ये विचार प्रबोधन नामक वैचारिक आन्दोलन के माध्यम से यूरोप में फैले इसकी विशेषताएं निम्न थी –
1 विकास की अवधारणा – प्रबोधन के चिंतकों का मानना था कि समय के साथ दुनिया पहले से बेहतर होती जाती है। विचारकों का मानना था कि विकास का वास्तविक मापदंड है मनुष्य की स्वतंत्रता में वृद्धि और जीवन में विकल्पों की प्रचुरता आधुनिक काल उन्नत इसलिए है क्योंकि मनुष्य पहले से अधिक स्वतंत्र है और वह विभिन्न जीवन शैलियों के बीच चुनाव कर सकता है।
2 तर्क या बुद्धि का युग – प्रबोधन के विचारकों का मानना था कि इस युग में तार्किक चिन्तन धीरे-धीरे मनुष्य के निर्णयों को निर्धारित करता है। न कि अंधविश्वास,धर्म या किसी कुलीन व्यक्ति का कहना। बुद्धि ही मनुष्य को सही रास्ता दिखा सकती है। इसलिए प्रबोधन का मुख्य मकसद लोगों का तर्क शक्ति जागृत करना और उसमें विश्वास जगाना है। तत्कालीन विचारक घर लबाक के शब्दों में हम मनुष्यों में हिम्मत बांधे उनमें अपनी ही बुद्धि में विश्वास जगाएं और सत्य की लालसा जगाएं ताकि वह अपने ही अनुभवों के आधार पर निर्णय लेना सीखें और किसी दूसरे के द्वारा प्रेरित कोरी कल्पनाओं से ठगे न जाएं।
3. विज्ञान – प्रबोधन ने माना कि वैज्ञानिक ज्ञान ही सही ज्ञान है। विज्ञान से उनका तात्पर्य था ऐसे निष्कर्ष जिन पर अवलोकनों व प्रयोगों के आधार पर तार्किक रूप से पहुंच गया हो और जिसका स्पष्ट प्रमाण हो। प्रबोधन के वैज्ञानिक के अनुसार ज्ञान का उद्देश्य सूची बनाना नहीं बल्कि चीजों के कारणों को समझना है। अब क्यों व कैसे – कैसे सवाल कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए। वे जानते थे कि इस ज्ञान की मदद से हम नई तकनीकों को विकसित कर सकते हैं। जिससे जीवन अधिक सुखमय हो सकता है।
4. विज्ञान बनाम धर्म – प्रबोधन के समर्थकों के विचार में धर्म मनुष्य को अंधविश्वासी डरपोक और गुलाम बना देता है। उनका मानना था कि धर्म के नाम पर सिर्फ दंगे होते हैं और मनुष्यों में खून बहाये जाते हैं। उन्हें डर था कि नास्तिकता मनुष्य को नैतिकता से दूर ले जा सकती है। विज्ञान की मदद से विश्व के बारे में जो जानकारी प्राप्त हो रही है वह इस बात का प्रमाण है कि सृष्टिकर्ता ईश्वर कितना महान है। लेकिन ईश्वर और धर्म को किसी व्यवस्था संगठन या पुजारियों के हाथ नहीं सौंपना चाहते थे।
5. स्वतंत्रता – प्रबोधन के समर्थक व्यक्तिगत स्वतंत्रता में गहरी आस्था रखते थे और उनका मानना था कि लोगों पर अगर कोई कानून लागू करना है तो वह उसकी सहमति से ही हो सकता है। इस कारण वे हर तरह की गुलामी गैर – लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं और निरंकुशता के खिलाफ थे लेकिन इसके बावजूद प्रबोधन के कई चिन्तन तत्कालीन निरंकुश शासकों के निकट मित्र और सलाहकार थे। उनके प्रभाव से इन शासकों ने अपने राज्यों में सुधार लाने का प्रयास किया।
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प्रश्न 13 : रूमानी आंदोलन किन बातों पर प्रबोधन से असहमत था?
उत्तर : जब प्रबोधन आन्दोलन अपने चरम पर था उसी समय यूरोप में औद्योगीकरण के कारण प्रकृति का दोहन प्रदूषण और मजदूरों का शोषण हो रहा था। प्रबोधन – विज्ञान और तकनीकी ज्ञान विकास के लिए आवश्यक बताया। स्थायी आंदोलन ने विकास के लिए प्रकृति के साथ सामंजस्य को आवश्यक बताया। इस प्रकार एक विकास पर बल देता है तो दूसरा सामंजस्य पर बल देता है । प्रबोधन ने संसार को जानने-समझने के लिए विज्ञान की शक्ति को स्वीकारा जबकि रूमानियों के संसार को समझने के लिए भावनाएं और अहसास ही पर्याप्त है माना।